नई दिल्ली, 11 जून : अब वायरस केवल बीमारी का कारण नहीं बल्कि बीमारी के इलाज का जरिब भी बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने ताजे पानी की झीलों में मौजूद लाखों वायरस जीनोम का गहराई से अध्ययन किया है, जिससे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह खोज न सिर्फ वायरल इकोलॉजी को नई दिशा देती है बल्कि गंभीर संक्रमणों के इलाज के लिए भविष्य की एंटीबायोटिक हो सकती है।
वैज्ञानिकों की बड़ी खोज : अब वायरस से ही बनेंगी एंटीबायोटिक दवाएं
मीडिया रिपोर्ट के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार आईआईटी मद्रास और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन- मैडिसन के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में यह दावा किया है। अध्ययन दुनिया की सबसे लंबी डीएनए आधारित निगरानी परियोजनाओं में से एक है। इसमें – अमेरिका के मैडिसन (विस्कॉन्सिन) की एक झील से बीते 20 वर्षों में लिए गए कुल 465 नमूनों का विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग तकनीक से झीलों में मौजूद 13 लाख से अधिक वायरस जीनोम को दोबारा जोड़ा और उन का पर्यावरण से संबंध समझा। इसमें मेटाजीनोमिक्स नामक अत्याधुनिक तकनीक का भी प्रयोग किया गया, जिसकी सहायता से यह स्पष्ट हुआ कि वायरस मौसम और साल के हिसाब से एक तय चक्र में सक्रिय होते हैं। इनमें से कई वायरस हर साल दोबारा उभरते हैं, जिससे उनका व्यवहार काफी हद तक अनुमानित माना जा सकता है। आईआईटी मद्रास के प्रो. कार्तिक अनंतरमण कहते हैं कि वायरस हमारे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को आकार देने में अहम भूमिका निभाते हैं।
बता दें कि यह शोध दर्शाता है कि वायरस का उपयोग कर झीलों में फैलने वाले हानिकारक शैवालों या विषैले बैक्टीरिया की बढ़त को रोका जा सकता है, जिससे पेयजल स्रोतों को संरक्षित किया जा सके। प्रो. कार्तिक ने जोर दिया कि कोरोना महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वायरसों की निगरानी और उनका समय रहते अध्ययन कितना जरूरी है। यह न केवल महामारी से बचाव में सहायक हो सकता है बल्कि यह भी बता सकता है कि वायरस पर्यावरणीय सेहत को कैसे बनाए रखते हैं।







