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    विश्वभर के तेल बाजारों में लगी ‘आग’

    ShagunBy ShagunFebruary 28, 2026Updated:February 28, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    अपनी ढफली, राग पराया : देवेश पाण्डेय ‘देश’ 

    ईरान-इज़राइल युद्ध के पहले ही दिन दुनियाभर के तेल बाजारों में जबरदस्त आग लग गयी है। इस आग से भारत भी अछूता नहीं रहेगा। साथ ही सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के दुर्दिन के दिन भी आ सकते हैं। इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध शुरु होने से न केवल मध्य पूर्व में बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी आर्थिक कठिनाइयां उत्पन्न होंगी। भारत के लिए ये मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, व्यापार लागत और सोने एवं डॉलर की बढ़ती कीमतों से उत्पन्न मुद्रास्फीति के रूप में सामने आयेंंगी।

     final war against Iran
    final war against Iran

    ईरान के खिलाफ इजरायल द्वारा छेड़ा गया युद्ध मध्य पूर्व में भीषण आग लगा रहा है,और वैश्विक अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट के कगार पर है। ईरान के प्रमुख बुनियादी ढांचे पर इजरायल के हमलों और तेहरान की जवाबी कार्रवाई ने ऊर्जा बाजारों को हिलाकर रख दिया है और अमेरिका, इजरायल और व्यापक विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे होकर दुनिया के 20′ तेल और एक चौथाई तरलीकृत प्राकृतिक गैस का प्रवाह होता है, के बंद होने का खतरा मण्डरा रहा है और ऐसी स्थिति की मात्र संभावना ने भी ऊर्जा की कीमतों को भयावह स्तर तक पहुंचा दिया है। अमेरिका के लिए जो पहले से ही 37 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज, भीषण मुद्रास्फीति और विदेशी उलझनों से व्यापक रूप से परेशान है, इस संघर्ष में पूर्ण रूप से शामिल होना आर्थिक और भू-राजनीतिक आत्महत्या साबित हो सकता है।

    सबसे बढक़र ईरान-इजराइल युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को खतरे में डाल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे प्रतिदिन 2 करोड़ बैरल तेल (वैश्विक आपूर्ति का पांचवां हिस्सा) और वैश्विक एलएनजी का एक चौथाई हिस्सा गुजरता है, अब ईरान द्वारा बन्द करने की धमकियों के कारण संकट का सामना कर रहा है। ईरान के तेल बुनियादी ढांचे पर इजराइली हमलों, जिनमें खारग द्वीप भी शामिल है (जो ईरान के तेल निर्यात के 90 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार है), ने वैश्विक आपूर्ति को बाधित कर दिया है।

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    ब्लूमबर्ग के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमतें जून 2025 की शुरुआत में 72 डॉलर से बढक़र 78 डॉलर प्रति बैरल हो गयी और गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि होर्मुज को बंद करने से कीमतें 150 डॉलर या उससे भी अधिक तक पहुंच सकती हैं। अमेरिका के लिए तेल की कीमतों में इस तरह का संकट विनाशकारी परिणाम ला सकता है। तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि से उपभोक्ता मुद्रास्फीति 0.5′ बढ़ जाती है। यदि कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं , तो अमेरिका में मुद्रास्फीति 5.5 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा – यह एक ऐसा कदम है जो पहले से ही नाजुक आर्थिक सुधार को पटरी से उतार सकता है।

    गैसोलीन की कीमतें, जो वर्तमान में लगभग 4 डॉलर प्रति गैलन हैं, बढक़र 7 डॉलर या उससे अधिक हो सकती हैं, जिससे पहले से ही उच्च जीवन लागत से जूझ रहे अमेरिकी परिवारों पर असहनीय दबाव पड़ेगा। क्लियर व्यू एनर्जी पार्टनर्स का अनुमान है कि इस तरह की मूल्य वृद्धि से घरेलू ईंधन खर्च में सालाना 2,500 डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है। परिवहन, विनिर्माण और कृषि जैसे प्रमुख क्षेत्रों को बढ़ती लागत का सामना करना पड़ेगा, जिससे 2025 के लिए आईएमएफ द्वारा अनुमानित 2 प्रतिशत आर्थिक विकास दर खतरे में पड़ जाएगी।

     final war against Iran
    final war against Iran

    वैश्विक वित्तीय बाज़ार भी डगमगा रहे हैं। 13 जून, 2025 को इज़राइल के शुरुआती हमलों के बाद अमेरिकी एसएण्डपी 500 सूचकांक में 2 प्रतिशत की गिरावट आयी थी और यूरोप के स्टॉक एक्सचेंज 600 में 1.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी। कैपिटल इकोनॉमिक्स का अनुमान है कि एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध वैश्विक विकास को 0.4 प्रतिशत तक कम कर सकता है और मुद्रास्फीति को 1.5 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है, जिससे दुनिया 1970 के दशक जैसी ‘मुद्रास्फीति’ की ओर बढ़ सकती है।

    लाल सागर में हौथी जैसे ईरानी समर्थकों द्वारा बढ़ते हमलों ने समुद्री बीमा लागत को 30 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो गई हैं। एशियाई आयात पर अत्यधिक निर्भर अमेरिका के लिए, इसका अर्थ है आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और कमी। इजराइल भी घरेलू आर्थिक संकट से जूझ रहा है। मिडिल ईस्ट मॉनिटर के अनुसार , युद्ध के चलते देश को प्रतिदिन 20 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है, जो 2025 तक के उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 प्रतिशत है। इजराइली अर्थशास्त्री याकोव शेनिन ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष इजराइल के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत तक खत्म कर सकता है और देश को एक गंभीर वित्तीय संकट में धकेल सकता है।

    इस युद्ध में अमेरिका की पूर्ण भागीदारी से अभूतपूर्व आर्थिक और भू-राजनीतिक जोखिम उत्पन्न होते हैं। 37 ट्रिलियन डॉलर के राष्ट्रीय ऋण और 1.8 ट्रिलियन डॉलर के वार्षिक घाटे के साथ, अमेरिका मध्य पूर्व में एक और युद्ध का खर्च वहन नहीं कर सकता। इराक का अनुभव—जिसमें 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक खर्च हुए—यह दर्शाता है कि इस तरह के हस्तक्षेप राष्ट्रीय संसाधनों को किस प्रकार समाप्त कर देते हैं। जनरल डगलस मैकग्रेगर ने चेतावनी दी है कि ईरान के सस्ते 20,000 डॉलर के ड्रोनों का 40 लाख डॉलर की पैट्रियट मिसाइलों से बचाव करने से अमेरिकी सैन्य बजट तेजी से समाप्त हो जाएगा। इसके अलावा, फारस की खाड़ी में तैनात 40,000 अमेरिकी सैनिक ईरानी मिसाइल हमलों के प्रति संवेदनशील हैं, जिससे भारी जानमाल का नुकसान होने का खतरा है।

    ईरान-इजराइल युद्ध अमेरिका, इजराइल और विश्व की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर खतरा है। तेल संकट, बढ़ती मुद्रास्फीति और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान इसके दुष्परिणामों का मात्र एक हिस्सा हैं। अमेरिका के लिए, इस युद्ध में प्रवेश करने का अर्थ होगा गैस की कीमतों में भारी वृद्धि, आर्थिक मंदी और वैश्विक स्तर पर कमजोर स्थिति और यह सब तब होगा जब उसकी जनता और सहयोगी इस कदम का विरोध कर रहे हैं। इजराइल को भारी वित्तीय और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है जो उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बना सकता है। कूटनीति, चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, इस आर्थिक संकट को टालने का एकमात्र रास्ता है। संयुक्त राज्य अमेरिका को इराक और अफगानिस्तान में अपनी पिछली गलतियों से सबक लेना चाहिए और संयम बरतना चाहिए, जिससे बातचीत का मार्ग प्रशस्त हो सके। विश्व एक गंभीर संकट के कगार पर खड़ा है और केवल कूटनीतिक सूझबूझ ही इसे इस कगार से वापस ला सकती है। – ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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