थाली और छेद

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व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
खाने के बाद थाली में छेद करना मेरा प्रिय शगल रहा है। थाली चाहे परिवार की हो या संपादक की उसमें मेरे किए छेद अवश्य मिल जाएंगे। पता नहीं क्यों लेकिन हां थाली में छेद करने में मुझे अपार खुशी मिलती है। दिन में एक दो बार किसी न किसी की थाली में छेद कर ही देता हूं।
मेरे मुहल्ले वाले यह बात अच्छे से जान गए हैं इसीलिए वे अपनी थाली मुझे नहीं देते। मुझे पत्तल पर खाना देते हैं ताकि उनकी थालियां बची रहें। मगर मैं भी बहुत चालू हूं, मौका मिलते ही उनकी थालियां चुरा लेता हूं। घर लाकर उनमें छेद करता हूं। भड़ास निकालता हूं।
थाली में छेद करने वाला एक अकेला मैं ही नहीं, यहां बहुत लोग थालियों में छेद कर रहे हैं। ऊपर से कितने ही मीठे बन लें पर अंदर से उतने ही कड़वे होते हैं। जमाना ही कड़वे लोगों का है। जब तक दो-चार गालियां किसी के लिए न निकाल लें, उनकी दोपहर की रोटी ही हजम नहीं होती। इसीलिए मैं मीठे और कड़वे दोनों ही तरह से लोगों से हट-बचकर रहता हूं।
पहले कोई भी ऐरा-गैरा आकर मेरी थाली में छेद कर जाता था। मैं कुछ कह भी न पाता था। हल्के में लेता था। जाने कितने छेद मेरी थाली में मेरे साथियों ने कर डाले। यारी-दोस्ती की खातिर कुछ न बोला। लेकिन जमाने ने मुझे चालाक होना सीखा ही दिया। मैंने उल्टे दांव खेलने शुरू किए। उन्हीं की थाली में छेद किए, जो खुद को विश्व का सबसे स्याना बंदा समझते थे। भलाई का जमाना न रहा पियारे। ईंट का जवाब जब तलक पत्थर से न मिले, सामने वाला समझता ही नहीं।
कुछ हवा ही ऐसी चल पड़ी है कि हम सब एक-दूसरे की खाई थाली में छेद करने को ‘अभिशप्त’ है। नौकर मालिक की थाली में छेद कर रहा है। बीवी पति की थाली में छेद कर रही है। नेता जनता की थाली में छेद कर रहा है। एम्प्लाई बॉस की थाली में छेद कर रहा है। डॉक्टर मरीज की थाली में छेद कर रहा है। भक्त ईश्वर की थाली में छेद कर रहा है। जिधर देखो उधर छेद ही छेद, थाली ही थाली नजर आ रही हैं।
और अगर उन्होंने बॉलीवुड की थाली में दो-चार छेद कर भी दिए तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा। क्या बॉलीवुड वाले दर्शकों की थाली में छेद नहीं करते? मतलब- खुद छेद करो तो कुछ नहीं, दूसरा कोई कर दे तो हाय, हाय। यह बात ठीक नहीं।
बैठे-ठाले थाली को बहस और चर्चा की जगह मिल गई। थाली तो सबसे चर्चा में है, जब से थाली और ताली बजाने का उद्घोष हुआ था। क्या जमकर तब सब ने थालियां और तालियां बजाई थीं। मैंने तो दो-चार थालियां ही बजा-बजाकर गड्ढा-युक्त कर दी थीं।
मेरे विचार में ‘जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं’ गम्भीर बहस का विषय है नहीं। खोजने बैठेंगे तो जाने कितनों की थालियां छेद-युक्त मिलेंगी। कुछ बेचारे तो ऐसे भी हैं, जो लोक-लाज के भय से बताते भी नहीं कि फलां ने उनकी थाली में छेद कर रखा है। थाली है तो छेद होंगे ही।
इसीलिए अब मैंने भी हर किसी को बताना बंद कर दिया है कि अगला मेरी थाली में छेद कर गया। बताने से कोई फायदा नहीं। उल्टा अपना ही नुकसान है। जमाने में और भी गम हैं थालियों और छेदों के सिवा।
मैं तो कहता हूं, अपनी थाली किसी को दो ही क्यों कि अगला छेद कर सके। यहां कोई किसी की जेब में से गिरा सिक्का तो छोड़ता नहीं, थाली क्या खाक छोड़ेगा। जो जिसकी थाली में खा रहा है, छेद भी बराबर कर रहा है। अपनी थाली बचा सकते हो तो बचा लो।

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