सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बड़े मायने, जय शाह, रोहन जेटली, खींवसर भी तो इनमें ही है शामिल
ओम माथुर
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी बिल्कुल जायज है। लेकिन यह कोई आज की बात नहीं है,सालों से ऐसे ही चल रहा है। महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनावों में पक्षपात को लेकर दायर याचिका पर आदेश देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा कि खेल संस्थाओं का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में होना चाहिए, जो खेल को समझते हो। ना कि ऐसे लोगों के हाथों मैं होना चाहिए जो बैट तक पकड़ना नहीं जानते हो।
कहा जाता है कि खेलों को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। लेकिन हमारे देश में खेलों के साथ सबसे ज्यादा राजनीति होती है। देश के अधिकांश राज्य क्रिकेट संघों पर राजनीतिज्ञों का कब्जा है। या तो खुद इस पर काबिज है या उनके परिवार का कोई सदस्य। ज्यादा दूर क्यों जाएं। अपने राजस्थान की बात कर ले। कांग्रेस राज में इसके अध्यक्ष सीपी जोशी थे। फिर उन्होंने पूर्व मुख्यमंतरी अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत के लिए पद छोड़ दिया। जब कांग्रेस सरकार गई और भाजपा राज आया,तो राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह खींवकर के बेटे धनंजय सिंह बन गए। हालांकि अब इसका विवाद अदालत में चल रहा है।
देश की राजधानी दिल्ली क्रिकेट संघ अध्यक्ष पद पर पहले भाजपा नेता अरुण जेटली काबिज रहे और उनके निधन के बाद उनके बेटे रोहन जेटली अध्यक्ष बन गए। मध्यप्रदेश किक्रेट संघ के अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया हैं। गौरतलब है कि क्रिकेट में राजनीतिक दखलअंदाजी कितनी है, इसका उदाहरण यह भी है कि गुजरात राज्य क्रिकेट संघ के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह तक रह चुके हैं। इनके अलावा भी कई मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों के क्रिकेट संख्या अध्यक्ष रह चुके हैं। पश्चिम बंगाल और कर्नाटक जैसे दो-तीन राज्यों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश राज्यों में हालत यही है। बंगाल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और कर्नाटक के पूर्व तेज गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद हैं। सुप्रीम कोर्ट इसी ओर इशारा कर रहा है कि ऐसे लोगों को क्रिकेट संघ का अध्यक्ष बनाना चाहिए।
क्रिकेट ही क्यों देश में ऐसा कौन सा खेल है, जो राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा है। जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक इनके संघों पर नेताओं को कब्जा है। चाहे वह कुश्ती हो। बॉक्सिंग हो। हॉकी हो। बास्केटबॉल हो। फिर दूसरा खेल। दरअसल खेलों का राजनीति से इतना ज्यादा घालमेल हो गया है कि यह तय करना मुश्किल हो गया है कि नेता खेल कर रहे हैं या खेलों के साथ राजनीति हो रही है। फिर क्रिकेट तो हमारे देश में बहुत पैसे वाला खेल हो गया है। इसके अधिकांश संघ बहुत धनवान है। सुप्रीम कोर्ट की भाषा में बैट पकड़ना तो बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे जय शाह को भी नहीं आता था। उनकी व इकलौती योग्यता सिर्फ यहीथी कि वो गृहमंत्री अमित शाह के पुत्र हैं और आज इसी योग्यता के बल पर वह आईसीसी के अध्यक्ष है।
बहरहाल,क्रिकेट को छोड़ दिया तो भारत इसीलिए अधिकांश खेलों में पिछड़ा हुआ है,क्योंकि यहां खिलाड़ियों को रिटायरमेंट के बाद खेल प्रशासक बनाने के बजाय उन्हें घर बैठा दिया जाता है और नेता खेलों पर भी कब्जा कर देते हैं। यह कब्जा राजनीति ही भारत के खेलों को बर्बाद कर रही है।






