बदला लेने से ज्यादा बेहतर है माफ कर देना

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बेटा आज घर वापस आया, तो काफी गुस्से में था। पिताजी ने वजह पूछी, तो उसने बताया कि उसके एक दोस्त ने सभी लोगों के सामने उसे कुरसी से गिरा कर अपमानित किया। सभी उस पर हंस रहे थे। उसने कहा, अब मैं भी मौका देख कर उसके साथ ऐसा ही करूंगा और बदला लूंगा। उसकी इस बात को सुनने के बाद पिताजी ने कहा- ‘जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को माफ नहीं कर पाते, जिसने हमारी भावनाओं को चोट पहुंचायी हो, तो हम दुश्मनी पाल लेते हैं और उससे बदला लेने की ताक में रहते हैं।

यदि हमारे पास वह बदला लेने का तरीका व मौका भी उपलब्ध हो जाये, तो हम उसे ले लेते हैं। ऐसे में यह सोचना गलत है कि बदला लेने से मन को शांति मिलेगी या हमारा फायदा होगा, क्योंकि बदला कभी पूरा नहीं होता। यह तो चक्र है, जो लगातार चलता रहता है। बदला फिर लौट कर आता है, जब सामने वाला उसका जवाब देता है और जल्द ही सारी चीजें हमारे कंट्रोल से बाहर हो जाती हैं।

फिर किसी को यह याद नहीं रहता कि यह सब शुरू कैसे हुआ था। खानदानी दुश्मनी इसी तरह शुरू होती है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि आंख के बदले आंख का नियम जल्दी ही इस दुनिया को अंधा कर देगी।

ऐसे में यदि हम बदला न भी लें, तो बदले की भावना हमारे अंदर सुलगती रहती है। हमें भीतर- ही-भीतर खाती है। हमें चिड़चिड़ा बना देती है। यह भी कोई अच्छी बात नहीं है। ऐसे में हमारे पास केवल एक ही विकल्प बचता है और वह है माफी।

यह सबसे बेहतरीन उपाय है और आगे बढ़ने का तरीका भी। इसलिए हमें सच्चे दिल से उन लोगों को माफ कर देना है, जिन्होंने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया। अगर हम निष्पक्ष रूप से देखें, तो यह तरीका हमारे पक्ष में ही है। साथ ही यह हमारी मानसिक शांति में इजाफा भी करता है।

दरअसल ‘माफी’ हमारे दिल में बार-बार आनेवाली बदले की भावना से हमें सुरक्षित रखने के लिए बनायी गयी है। यह हमें नकारात्मक विचारों के प्रभाव से उबरने के लिए तैयार किया गया है। माफ करने का मतलब हार मानना बिल्कुल नहीं है। माफ करने का मतलब तो विजयी होना है।’

  • हमें सामने वाले का दृष्टिकोण समझना चाहिए और अगर फिर हमें लगता है कि वह सही है, तो हम उन्हें माफ कर सकते हैं, माफी मांग सकते हैं।
  • आप जितना सामने वाले के अभिनय में आगे बढ़ते जायेंगे, आप उनकी प्रकृति, भावनाओं और सोच को समझने लगेंगे। रिश्ता सुधरता जायेगा।

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