प्रेस वार्ता में राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद समझौता प्रस्ताव में सैयद वसीम रिज़वी ने आज महंत नरेन्द्रगिरि के साथ मांग पत्र में मीडिया के समक्ष क्या प्रस्ताव् रखे कृपा जरूर पढ़ें-
सेवा में,
सम्पादक महोदय,
एै दोस्त करो हिम्मत, कुछ दूर सवेरा है – सै. वसीम रिज़वी
महोदय बहुत लम्बे समय से हिन्दुस्तान में धार्मिक फ़साद कराने वाला सबसे बड़ा प्रकरण राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद जोकि हिन्दू और मुसलमानों के लिए धार्मिक अना का मुद्दा बना हुआ है जिसके चलते दो हज़ार से ज़्यादा लोग साम्प्रदायिक दंगों में मारे जा चुके हैं, हज़ारों घर बर्बाद हो चुके हैं, जैसा कि सब जानते हैं। अयोध्या में विवादित भूमि पर पहले मुग़ल शासक बाबर के समय में बना बाबरी मस्जिद मीर बाक़ी द्वारा बनायी गयी थी जोकि बाबर का सेनापति था, जैसा कि इतिहासकार कहते हैं कि मीर बाक़ी एक लम्बी फ़ौज लेकर अवध आया और उसने अयोध्या में मन्दिरों को तोड़ कर एक मस्जिद बनायी। उक्त भूमि हिन्दुओं की आस्था के अनुसार मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र जी का जन्म स्थान है।
हिन्दू भाई अपनी आस्था के अनुसार राम मन्दिर वहां पुनः बनाना चाहते हैं। वर्तमान में अब मौके पर मस्जिद भी मौजूद नहीं है, परन्तु एक लम्बे समय से मा. न्यायालयों में यह प्रकरण लम्बित है। प्रकरण की असलियत यह है कि बाबरी मस्जिद को सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड ने सुन्नी मस्जिद कहते हुए एक अवैध अधिसूचना दिनांक 26-02-1944 के अन्तर्गत सुन्नी वक्फ बोर्ड में दर्ज कर लिया था जोकि विवादित भूमि पर बनायी गयी मस्जिद जिसका नाम बाबरी मस्जिद बाबर के मरने के पश्चात 1530 के बाद पड़ा। यह मस्जिद जब से बनी है तब से लेकर 1945 तक इस मस्जिद के मुतवल्लियान हमेशा शिया मुसलमान रहे। 1944 में एक अवैध अधिसूचना के अन्तर्गत इसे सुन्नी मस्जिद घोषित कर दिया गया। उक्त अधिसूचना मा. सिविल न्यायालय, मा. उच्च न्यायालय एवं मा. उच्च्तम न्यायालय तक से अन्य दूसरे प्रकरणों में अवैध घोषित की जा चुकी है, अर्थात उक्त अधिसूचना के अन्तर्गत जो भी वक्फ सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत किये गये थे उनकी मान्यता शून्य हो चुकी है।
उक्त अवैध अधिसूचना के अन्तर्गत ही बाबरी मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत की गयी थी। मा. उच्चतम न्यायालय व मा. उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 26-02-1944 की अधिसूचना अवैध घोषित कर देने के कारण सुन्नी वक्फ बोर्ड व सुन्नी समाज के सभी पक्षकारों का अधिकार वक्फ मस्जिद बाबरी से समाप्त हो जाता है, क्योंकि मीर बाक़ी द्वारा एक मस्जिद का निर्माण कराया गया था। सभी मस्जिदें धार्मिक कानून एवं भारतीय कानून के अन्तर्गत वक्फ मानी जाती हैं और सभी वक्फों का कस्टोडियन वक्फ बोर्ड का होता है। अगर बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि प्रकरण से संबंधित किसी भी भाग व पूर्ण भूमि पूर्व बनी मस्जिद को दृष्टिगत रखते हुए मा. न्यायालय द्वारा दी जाती है तो वे वक्फ मस्जिद के कस्टोडियन को ही प्राप्त होगी, किसी अनाधिकृत व्यक्ति को या पूरे समाज कोवक्फ सम्पत्ति का कब्जा नहीं हस्तांतरित किया जा सकता।
सुन्नी वक्फ बोर्ड 1944 की अधिसूचना रद्द होने के कारण उक्त मस्जिद का कस्टोडियन नहीं रहा और जो भी अन्य मुस्जिद पक्षकार मा. उच्चतम न्यायालय में लम्बित प्रकरण में पक्षकार है वे सभी सुन्नी समाज के व्यक्ति हैं मात्र शिया वक्फ बोर्ड सूट नम्बर-5 में अकेला पक्षकार है। शिया वक्फ बोर्ड ने उक्त प्रकरण को धार्मिक नियमों के अनुसार अध्ययन किया और राष्ट्र हित में यह निर्णय लिया कि वे इसमें अपना पक्ष मा. उच्चतम न्यायालय में रखेगा कि साक्ष्यों के आधार पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का इस मस्जिद से कोई संबंध शेष नहीं बचा है और मा. उच्च न्यायालय ने उक्त सम्पत्ति को जो तीन भाग में बांटा है उसमें भी सुन्नी वक्फ बोर्ड को उक्त सम्पत्ति का कोई भाग नहीं दिया गया है, बल्कि मा. उच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णय में एक तिहाई भाग मुस्लिम पक्ष को दिये जाने की बात कही है और उसी निर्णय में सुन्नी वक्फ बोर्ड का अधिकार खारिज किया है, अर्थात एक तिहाई भाग जो मा. उच्च न्यायालय द्वारा मुस्लिम पक्ष को दिये जाने की बात कही गयी है उस पर मात्र शिया वक्फ बोर्ड का अधिकार बनता है।
शिया वक्फ बोर्ड द्वारा राष्ट्र हित में यह निर्णय लिया गया कि वे विवादित भूमि जोकि हिन्दू भाईयों की आस्था के अनुसार राम जन्म भूमि है, पर कोई भी मस्जिद का निर्माण किसी भाग पर नहीं करेगा, क्योंकि जिस भूमि के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद हो उस विवाद के चलते लोगों को जानी व माली नुक़सान हो रहा हो और पूरे हिन्दुस्तान में धार्मिक संघर्ष होने की आशंका हो तो उक्त भूमि पर मस्जिद बना कर इबादत करना गै़र-इस्लामिक है। शिया वक्फ बोर्ड द्वारा हिन्दू भाईयों के समक्ष एक समझौता प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसमें मुख्य रूप से यह कहा गया कि अयोध्या में वे समस्त भूमि पर पूर्व में विवादित मस्जिद बनी थी जिसका अस्तित्व वर्तमान में समाप्त हो चुका है, पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण कर ले और शिया वक्फ बोर्ड को एक नई मस्जिद के लिए हुसैनाबाद स्थित घण्टा घर के सामने खाली पड़ी नजू़ल भूमि में से एक एकड़ भूमि उप्र सरकार द्वारा दोनों पक्षों के बीच हो रहे समझौते में सहयोग करते हुए आवंटित कर दी जाये जिसमें वे मस्जिद का निर्माण कर लेगा। शिया वक्फ बोर्ड का प्रस्ताव इस प्रेस विज्ञप्ति के साथ संलग्न है। जिस पर अनेक मुख्य हिन्दू समाज के महंतों एवं राम मंदिर के कुछ पक्षकारों द्वारा सहमति दी गयी है। शिया वक्फ बोर्ड द्वारा उक्त प्रस्ताव जिस पर महंतों की सहमति है।
प्रकरण की वास्तविकता को उल्लिखित करते हुए मा. उच्चतम न्यायालय को प्रस्तुत कर दिया गया है। शिया सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड उप्र को पूर्ण विश्वास है कि मा. उच्चतम न्यायालय प्रकरण की वास्तविकता को समझ कर प्रकरण में न्याय करेगा। खेद का विषय है कि मुसलमानों के कुछ मुल्ला मौलवी एवं मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड बगैर किसी अधिकार के राम मन्दिर बाबरी मस्जिद प्रकरण में धार्मिक उन्माद पैदा कर रहे हैं। मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड का कार्य क्षेत्र मुसलमानों के धार्मिक कानूनों तक सीमित है जबकि वक्फ बोर्ड का कार्य क्षेत्र वक्फ सम्पत्तियों का कस्टोडियन होने के नाते उसके संरक्षण एवं प्रबन्ध कराने के लिए अधिकृत है। नई मस्जिद कहां बनाई जायेगी या वक्फ से संबंधित झगड़ा राष्ट्र हित में शांति पूर्वक कैसे तय होगा इसका अधिकार वक्फ बोर्डों को प्राप्त है। मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड एवं चन्द तथाकथित मुल्ला वक्फ बोर्ड के कार्य क्षेत्र में हस्ताक्षेप कर रहे हैं जिसमें उनका निजी स्वार्थ स्पष्ट दिखाई देता है।
दिनांकः 20-11-2017 धन्यवाद!
(सै0 वसीम रिज़वी)






