कितना गांधीवादी है प्रियंका का परिवार ?

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कांग्रेस की महासचिव और स्टारप्रचारक प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ बड़ी बिडंबना है। एक तरफ वह गांधी नगर में लोगों को महात्मा गांधी के चिंतन का पाठ पढ़ा रही थी, दूसरी तरफ उनके पति रॉबर्ट वाड्रा अवैध व अकूत सम्पत्ति के आरोप में जांच एजेंसियों का चक्कर लगा रहे थे। उनपर राजस्थान और हरियाणा में कृषि भूमि घोटाले के आरोप पहले से थे, अब लंदन में अनेक सम्पत्तियां चर्चा में है। यदि इन आरोपो में तनिक भी सच्चाई है, तो यह मानना पड़ेगा कि प्रियंका ने अपने पति को गांधी चिंतन से वंचित रखा है। इतना ही नहीं सब कुछ उनकी जानकारी में था, इसलिए जिम्मेदारी उनकी भी बनती है। महात्मा गांधी ने तो सम्पत्ति पर विस्तृत विचार व्यक्त किये थे। इस संदर्भ में उन्होंने ईमानदारी, अपरिग्रह और ट्रस्टीशिप का विशेष महत्व बताया। इस प्रकार उन्होंने निजी व समाज जीवन का दर्शन दिया।
यहां सवाल प्रियंका से भी है। क्या उन्होंने रॉबर्ट को कभी यह समझाया कि इतनी दौलत का क्या होगा, क्यों इसके पीछे भाग रहे हो, महात्मा गांधी के सिद्धांतों को समझो। ईमानदारी से व्यवसाय करो। अपने को सम्पत्ति का मात्र ट्रस्टी मानों। जबकि प्रियंका यह भी जानती थी कि उनके पति को केंद्र, राजस्थान, हरियाणा की कांग्रेस सरकार के कारण अनुचित लाभ मिल रहा है। कुछ समय पहले स्वयं प्रियंका भी हिल स्टेशन पर अपने सपनो के भवन के लिए बहुत सक्रिय थी। क्या ऐसे में महात्मा गांधी की दुहाई देने दोहरे आचरण का प्रमाण नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा कि कांग्रेस का आचरण तो गांधीवाद के विरोध में रहा है। इसके शीर्ष स्तर पर परिवारवाद, जातिवाद और सम्प्रदायवाद है।
यही कारण है कि इसके शीर्ष नेता आतंकी सरगना का नाम सम्मान से लेते है। प्रियंका को भी परिवारवाद के चलते लाभ मिला है। गांधीनगर की सभा में जातिवादी आंदोलन से निकले नेता को भी पार्टी में शामिल करने के बाद महिमामण्डित किया गया। इसी मंच से महात्मा गांधी के दर्शन पर उपदेश दिए जा रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने भाषण, भाषा, शैली के चलते स्वयं को हल्का बना लिया है। उनकी बातों में अध्यक्ष पद की गरिमा का नितांत अभाव है। वह प्रधानमंत्री के लिए अमर्यादित व सड़क छाप नारे लगवाते है। खुद पेरोल पर है।
राफेल सौदे पर उनके पास कोई तथ्य नहीं ,फिर भी हंगामा जारी है। यही कारण है कि क्षेत्रीय पार्टियां उनसे दूरी बना रही है। ऐसे में यह माना गया था कि प्रियंका गांधी वाड्रा का चुनाव प्रचार अलग ढंग का होगा। लेकिन वह भी पुराने और तथ्यविहीन मुद्दे ही उठा रही है।प्रियंका ने साबरमती आश्रम में एक वृक्ष के नीचे बैठने का उल्लेख ऐसे किया जैसे यहां उनको देशभक्ति का ज्ञान प्राप्त हुआ। वह बोलीं कि साबरमती के उस आश्रम में गई, जहां से महात्मा गांधी ने इस देश की आजादी का संघर्ष शुरू किया था। वहां उन पेड़ों के नीचे बैठे हुए मेरे आंसू आ गए। मैंने उन देशभक्तों के बारे में सोचा, जिन्होंने इस देश के लिए अपनी जान दे दी। जिनके बलिदानों पर इस देश की नींव पड़ी है। वहां बैठे हुए मन में ये बात आई कि ये देश प्रेम, सद्भावना और आपसी प्यार के आधार पर बना है लेकिन आज जो कुछ देश में हो रहा है, उससे दुख होता है।
यदि प्रियंका की बात को सच माना जाए तो प्रश्न भी उठता है। वह इतने दिन तक निष्क्रिय क्यों थी। क्या साबरमती में वृक्ष के नीचे उन्हें यह अनुभूति हुई। वैसे यह घिसापिटा मुद्दा है। इस बात का खुलासा हो गया है कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित ढंग से यह मुद्दा चलाया गया था। इसे सम्मान वापसी गैंग ने हवा दी थी। काठ की यह दूसरी हांडी दुबारा नही  चढ़ी। लेकिन प्रियंका आज भी इसी के सहारे है। वह भी राहुल ,लालू, तेजस्वी,अखिलेश आदि की तरह पन्द्रह लाख रुपये के लिए परेशान है, उन्हें भी नफरत बढ़ती हुई दिखाई दे रही है,  प्रियंका गांधी वाड्रा ने  कहा जो पन्द्रह  लाख आपके खाते में आने थे, वह कहां हैं। दो करोड़ नौकरियों के वादे का क्या हुआ।
फिजूल के मुद्दे उठाए जाएंगे, इसलिए आपको जागरूक होना है क्योंकि इस चुनाव के जरिए आप अपना भविष्य चुनने जा रहे हैं। इसका क्या मतलब हुआ, जब कांग्रेस सरकार बनाती थी, तब क्या लोग अपना भविष्य नहीं चुनते थे। प्रियंका के भाषण का सन्दर्भ स्पष्ट है। वह बताना चाहती है कि सभी समस्याएं पांच वर्ष में पैदा हुई है। कांग्रेस शासन में कोई  बेरोजगारी नहीं थी, गरीबी नहीं थी। किसानों को बिना कठिनाई के यूरिया और उन्नत बीज मिलते थे, सिंचाई की सभी जगह व्यवस्था थी आदि। जबकि पांच वर्ष में नरेंद्र मोदी ने गरीब,बेरोजगारों, किसान, के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं लागू की है। करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन, आवास, यूरिया ,सिंचाई आदि की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुए है।
वित्तमंत्री ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के आरोपों का माकूल जबाब दिया।  कहा कि यदि उनके पूंजी निर्माण की आपराधिक दृष्टि से समीक्षा किया जाए तो तथ्य ही सब बयान कर देंगे। परंपरागत तौर पर कई लोगों ने रिश्वतखोरी के जरिए भ्रष्टाचार पर भरोसा किया गया होगा, लेकिन अब एक नया तरीका स्थापित कर दिया गया है। राजनीतिक और वाणिज्यिक सौदे कराने वाले और अपना काम  कर  निकल लेने वाले आपको मनपसंद सौदों का सुख देते हैं। इसमें बहुत कम निवेश में कुछ खास लोगों को छप्पर फाड़ मुनाफा मिलता है। राजनीतिक इक्विटी अंशपूंजी से सद्भावना पैदा की जाती है। इससे आप फैसलों को प्रभावित कर पाते हैं। जब पोल खुल जाती है तो लाभार्थी चालाक कारोबारी फैसलों की आड़ में छुपने लगते हैं।
शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। जाहिर है कि जेटली के बयान कांग्रेस के शीर्ष परिवार के लिए था। इसमें कोई पेरोल पर है, किसी के खिलाफ गंभीर जांच चल रही है। ऐसे लोगो का गांधीवाद पर उपदेश देना अजीब लगता है। गांधी जी ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी थी। उनका कहना था को कांग्रेस का लक्ष्य देश को आजाद कराना था। यह कार्य हो गया। अब कांग्रेस की जरूरत नहीं रही। लेकिन तब से लेकर आज तक कांग्रेस के लोग गांधी जी की सलाह का मखौल उड़ा रहे है। परिवारवाद, सम्पत्ति ईमानदारी, आदि पर कितने कांग्रेसी अमल कर रहे है।
सच्चाई यह है कि कांग्रेस को गांधी जी व बल्लभ भाई पटेल की याद अकारण नहीं आई है, उनसठ वर्ष बाद गुजरात में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक करने के पीछे भी वोट की चिंता थी। नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी के स्वच्छता सम्बन्धी विचार को राष्ट्रीय अभियान बना दिया। पटेल जी का विश्व प्रसिद्ध स्मारक बनवा दिया, आंबेडकर के पांच स्मारकों का निर्माण पूरा कर दिया। कांग्रेस इसमें बहुत पीछे रह गई। यही कारण है कि उनके शीर्ष नेतृत्व को  गुजरात जाकर गांधी जी व सरदार पटेल को याद करना पड़ा।
– यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।

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