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    वीटो मसले पर राहुल का शर्मनाक बयान

    By March 15, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगने के राहुल गांधी के बयान से पाकिस्तान खुश था, उसके मीडिया में ये बयान खूब चले। अब वीटो प्रकरण पर राहुल गांधी के बयान से चीन गदगद है। क्योंकि राहुल ने अपने ही प्रधानमंत्री को चीन से डरने वाला बताया। इस तरह अपरोक्ष रूप में राहुल ने चीन के राष्ट्रपति को साहसी बताया है। ऐसे मनोबल बढ़ाने वाले बयान से चीन का खुश होना स्वभाविक है। बिडंबना देखिये मसूद अजहर को बचाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व रूस ने चीन की निंदा की है। इन्होंने अजहर के खिलाफ कोई दूसरा कदम उठाने का ऐलान किया है। लेकिन राहुल अपनी ही सरकार पर हमला बोल रहे है। जबकि अन्य सदस्य देशों का रुख भारत की सफलता माना जायेगा।
    ऐसे में नरेंद्र मोदी सरकार की प्रशंसा होनी चाहिए थी। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मोदी का विरोध में इतना बेकरार रहते है कि उन्हें पाकिस्तान, चीन जैसे देशों की प्रशंसा में भी संकोच नहीं होता। जबकि  वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियां इस प्रकार की इजाजत नहीं देती। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन का पैंतरा कोई नया नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी चीन यही कर चुका है। इतना ही नहीं उसने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणांचल प्रदेश यात्रा का विरोध किया था। उसके बाद मनमोहन सिंह की चीनी नेताओ से मुलाकात भी हुई थी। लेकिन मनमोहन ने ये मुद्दे नहीं उठाए। उस समय राहुल ने यह नही कहा था कि मनमोहन चीन से डरे हुए है।
    राहुल ने जो मोदी के विरोध में कहा वह आपत्तिजनक है। इसे राष्ट्रीय हित के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।  राहुल से उम्मीद थी कि वह इस मसले पर वह चीन की निंदा करते। लेकिन राहुल गांधी की कांग्रेस से इस प्रकार की उम्मीद करना बेमानी होता जा रहा है। राहुल गांधी चीन को कोसने की जगह अपनी ही सरकार पर हमला करने लगे। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी की सरकार घुटने टेक रही है। जब भारत के खिलाफ चीन कदम उठाता है तो मोदी के मुंह से एक शब्द नहीं निकलता। मोदी की कूटनीति गुजरात में शी जिनपपिंग को झूला झुलाना, दिल्ली में गले लगाना और चीन के सामने घुटने टेक देने की रही है।  नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति से डर गए है।
    राहुल को ऐसे बचकाने बयानों से बचना चाहिए था। जब राहुल ने अपने देश की सरकार पर हमला किया, तो उनके प्रवक्ता क्यों पीछे रहते। प्रवक्ता ने भी चीन की आलोचना नहीं की। वह बोले कि मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों से खिलवाड़ कर रही है। इन नेताओं से पूंछना चाहिए कि चीन के वीटो से भारत सरकार गुनाहगार कैसे हो गई। अजहर के खिलाफ अमेरिका , ब्रिटेन, और फ्रांस ने सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा था। भारत तो इसका स्थायी सदस्य भी नहीं है। सुरक्षा परिषद में चीन का वीटो विश्व समुदाय के विरोध में था। इसे केवल भारत के विरोध में नहीं देखा जा सकता। यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी प्रत्येक विदेश यात्राओं में आतंकवाद का मुद्दा उठाते रहे है। बेशक चीन ने वीटो किया, लेकिन सुरक्षा परिषद के चार अन्य स्थायी सदस्यों ने आतंकी सरगना पर प्रतिबंध का समर्थन किया। यह भारत के लिए सन्तोष का विषय है।
    मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने का  प्रस्ताव चीन के वीटो से पारित नहीं हो सका।  यह एक प्रकरण मात्रा नहीं है। बल्कि इसने कई ज्वलंत प्रश्न उठाये है। पहला यह कि दुर्दांत आतंकी सरगना को बचाने वाली सुरक्षा परिषद का क्या औचित्य रह गया है, दूसरा क्या इस प्रकार वैश्विक आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है। इसका सकारात्मक पक्ष भी है। पहला यह कि सुरक्षा परिषद के शेष चार स्थायी सदस्यों ने चीन को चेतावनी दी है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस ने चीन के कदम पर नाराजगी जताई है। इनका कहना है कि अब मसूद अजहर से निपटने के दूसरे प्रयास किये जायेंगे। दूसरा सकारात्मक तथ्य यह कि सुरक्षा परिषद के चार स्थायी सदस्यों ने आतंकवाद पर भारतीय विचार का समर्थन किया है।
    सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग पुरानी है। जिन परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की नामित और उन्हें वीटो का अधिकार दिया गया था, आज उसमें बड़ा परिवर्तन आ गया है। कोई राजनीतिक मसला होता तो इसे नजरअंदाज  किया जा सकता था। लेकिन यह विषय मानवता से जुड़ा है। इस्लामी आतंकवाद विश्व शांति के सामने चुनौती बन गया है। इसके लिए खासतौर पर सुरक्षा परिषद को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए थी।
    राहुल गांधी के चीन की जगह अपनी सरकार पर हमले का जेटली ने जबाब दिया। कहा कि चीन और कश्मीर दोनों पर एक ही व्यक्ति ने गलती की है। दो अगस्त, उन्नीस सौ पचपन  को जवाहर लाल नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था। जिसमें कहा गया था कि अनौपचारिक रूप से अमेरिका द्वारा सुझाव दिया गया है कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाना चाहिए। लेकिन सुरक्षा परिषद में नहीं। इसके साथ अमेरिका चाहता था कि भारत को सुरक्षा में उसकी जगह लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस पत्र के अनुसार, हम निश्चित रूप से अमेरिका की पेशकश स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि इसका मतलब है कि चीन के साथ अन्याय करना और यह चीन जैसे महान देश के साथ अनुचित होगा कि वो सुरक्षा परिषद में न हो।
    क्या इस बात के लिए राहुल अपने पूर्वज जवाहर लाल नेहरू को चीन से डरा हुआ बताएंगे। उन्होंने भारत को मिलने वाली एक उपलब्धि को नकारा था। नेहरू जी ने हिंदी चीनी भाई भाई का नारा लगाया था क्या हुआ था उसका। नरेंद्र मोदी ने अतिथि बन कर आये जिनपिंग को सत्कार दिया, इसमें अनुचित क्या था। मोदीं ने चीन से तनाव कम करने का प्रयास किया, लेकिन उस पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं किया। मोदीं भारत की सैन्य शक्ति बढ़ाने का भी प्रयास करते रहे। यही कारण था कि डोकलाम में भारत के सैनिक चीन के मुकाबले में डटे रहे। अंत मे इन्हीं जिंगपिंग ने अपने सैनिक वापस बुलावे थे।क्या राहुल अपने पिता राजीव गांधी की निंदा करेंगे ,जिन्होंने चीन की यात्रा की थी।
    यह नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक सफलता थी कि चीन ने भी पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध नहीं किया। उसने पाकिस्तान की इस मामले में कोई  सहायता नहीं कि थी। इस्लामी मुल्कों के संघठन ने पाकिस्तान की बात ठुकरा कर भारत को आमंत्रित किया था। चीन के वीटो से सुरक्षा परिषद के शेष सभी स्थायी व स्थायी सदस्य उससे नाराज है, यह भारत की कूटनीतिक सफलता है।
    भारत ने भी चीन के रुख पर निराशा जताते हुए कहा कि वह भारतीयों पर हमले के जिम्मेदार आतंकियों को न्याय के दायरे में जाने के अन्य विकल्पों पर काम करेगा। साफ है कि नरेंद्र मोदी चीन से डरने वालों में नहीं है। सुरक्षा परिषद के अनेक राजनायिकों के बयान भी भारत की कूटनीतिक सफलता है।
     एक राजनयिक ने कहा कि यदि चीन मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में इसी तरह अड़ेंगे डालता रहा तो जिम्मेदार अन्य सदस्य देशों को मजबूर होकर सुरक्षा परिषद में दूसरे कदम उठाना पड़ेंगे। मसूद अजहर के गुट जैश-ए-मोहम्मद को संयुक्त राष्ट्र पहले ही अलकायदा से जुड़ा मानता है। सुरक्षा परिषषद के किसी राजनयिक की चीन को यह असामान्य कड़ी चेतावनी है। यह नरेंद्र मोदी की सफल विदेश यात्राओं का अपरोक्ष लाभ है।अमेरिकी विदेश मंत्रालय के उप-प्रवक्ता रॉबर्ट पैल्लाडिनो ने कहा कि मसूद अजहर, संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के सारे मानकों पर फिट बैठता है। मसूद मामले से चीन अमेरिका के साझा हितों पर प्रतिकूल प्रभाव होगा। यह बयान भारत की सफलता है।
       डोकलांम विवाद के  समय राहुल चीन के राजदूत से गोपनीय रूप में मिले थे। पहले इस मुलाकात को छिपाया गया, इनकार किया गया। जब खुलासा हुआ तो माना। लेकिन वह सीमा पर तनाव के समय चीनी अधिकारी से क्या बात करने गए थे, यह देश को पता नहीं चल सका। इसके बाद दोनों सर्जिकल स्ट्राइक व चीन के वीटो पर राहुल के बयान अनावश्यक थे। विरोध का यह स्तर शर्मनाक ही नहीं राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल है।

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