अगले वर्ष की अभी से तैयारी!

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अभी हाल ही में हमारे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पहले विधान सभा चुनाव और फिर निकाय चुनाव संपन्न हुए। अगले वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव, को होने में अभी 1 वर्ष से अधिक का समय शेष हैं। लेकिन अभी से सभी राजनीतिक दलों ने इस चुनावी समर में उतरने की अपनी तैयारी करने शुरू कर दिया है जहाँ तक हम आगामी चुनाव के विषय में बात करें तो इस चुनाव में एक बहुत बड़ा अंतर होगा। इस दफे सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चुनौती मुख्य विपक्षी दल की नहीं, वल्कि अपने ही वादे पर खरे उतरने की होगी।
वर्त्तमान समय में देश के दो बड़े मुद्दे ऐसे हैं जिसके कारण केंद्र की मौजूदा सरकार के लिए मुश्किले खड़ी हो सकती हैं। इनमें से सबसे पहले तो देश के किसानों की हालत पर एवं दूसरी ओर बेरोजगारी के हालातों पर भारत में लगातार खेती-किसानी की अनदेखी विगत 70 वर्षों होती चली आ रही है। जबकि कृषि हमारे देश में सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करने वाले क्षेत्रों में से एक है। खेती के विषय में अब तक के सरकारों की सोच न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से आगे जाती हुई दिखाई नहीं दे रही है।
केंद्र सरकार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद से किसानों की हालतों में सुधार लाने के उद्देश्य से कई उपाय किए गए हैं। लेकिन वर्त्तमान समय कृषि क्षेत्र की दो विकट समस्याएं हैं उनमे से प्रथम तो यह है, जब खेतों में फसल पैदावार भरपूर होती है तो उस समय दाम नीचे गिरने लग जाते हैं, ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई औचित्य नहीं रह जाता वहीं पर सरकारी खरीद के प्रयास भी ऐसे वक्त किसानों के काम नहीं आते है। दूसरी समस्या इससे भी अधिक बड़ी है और वह यह है कि यह समझना कि हमारे देश में किसानों के पैदावार का उचित मूल्य न मिल पाना हमारे ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है।
हमारे यहाँ के कृषक वर्गों की एक और समस्या यह है कि खेती के अलावा उनके पास अन्य किसी अतिरिक्त आमदनी के जरिए के न होने से खेती किसानी में काम आने वाली अत्याधुनिक उपकरणों के आ जाने से हमारे किसान अपनी परंपरागत संसाधनों का त्याग करते चले गए जिनमे से मुख्यतः ट्रैक्टर के आजाने के बाद से बैलों से जुताई बुआई के काम लेने जैसी परिपाटियों के खत्म हो जाने से बैल तो चले ही गए साथ ही साथ गाय, भैंस, बकरी और दूसरे जानवरों के पलने का चलन धीरे धीरे कम होते चले गए और उन जानवरों के लिए चरागाह खेत बन गए हैं। रासायनिक खादों एवं ट्रैक्टरों के आजाने से वह अपने साथ कर्ज दायक नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपने साथ लाई। मौजूदा समय में ट्रैक्टर किसानों की जरूरत से ज्यादा प्रतिष्ठा की विषय वस्तु बन जाने के कारण किसानो ने अपने खेत गिरवी रखकर कर्ज लेने शरु कर दिए जिसका नतीजा यह हुआ कि किसानों लोग आर्थिक बोझ के नीचे दबते चले जाने से उन किसानों की वर्त्तमान समय की सबसे बड़ी मांग कर्ज माफी बन गई है। यहाँ यह प्रश्न उठाना लाजमी है कि यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा? बार-बार कर्ज माफी जैसी मांगे, किसान और ऐसा करने वाली सरकारों, दोनों ही के लिए नुकसानदेह है।
मौजूदा सरकार के सामने ग्रामीण हालात को चुस्त दुरुस्त कर के उनके समस्याओं को दूर करना, देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं राजनीतिक नजरिये से भी सबसे बड़ी चुनौतीयों में से एक होगी।
 हाल में हुए गुजरात विधानसभा के चुनाव ने हमें इस समस्या को फिर से राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया है। हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों की समस्यों का हल उनके फसलों के उत्पादन की उचित मूल्य उन्हें मिले।
फसलों की बहुत अच्छी पैदावार भी किसानों के लिए एक समस्या बन कर सामने आयीं है। एमएसपी पर राज्य सरकार ने बोनस भी दिया, लेकिन जब बाजार में दाम एमएसपी से नीचे हों तो एमएसपी कितना भी हो, यह महत्वहीन होकर रह जाता।
यदि हम देश के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों को देखें तो वहाँ के किसान खेती के अलावा सब्जी, दूध के अलावा अन्य उत्पादन से भी जुडे हुए है। सब्जी की खेती करने वाले किसान अपने खेत से वर्ष में तीन फसल लेते हैं। यदि एक फसल में घाटा हो भी जाये तो बाकी के दो फसलों से उसकी भरपाई हो जाती है। यह बात पुरे देश पर एक समान रूप से लागू होती है कि किसानों की खेती से होने वाली आमदनी लगातार घटती चली जा रही है, ऐसी अवस्था में इस समस्या का निदान केवल एमएसपी को बढ़ाने एवं कर्ज माफी जैस तात्कालिक उपायों से बहुत कुछ होने वाला नहीं है। वहीं पर यदि हम देश के छोटे किसानों की बात करें तो किसानों के लिए खेती के अलावा भी अन्य आय के साधन उन्हें उपलब्ध कराने की बहुत आवश्यकता है। नए गोदामों एवं शीत गृह के निर्माण एवं खाद्य प्रसंस्करण के माध्यमों से किसानों की आय में बढ़ोत्तरी हो सकती है, लेकिन इन साबो के साथ ही साथ पशुपालन एवं कुटीर उद्योगों को भी फौरी तौर पर शुरू कराया जा सकता है। यदि वर्त्तमान सरकार उद्योगों से कहे कि वे सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी) के जरिये रेवड़िया बांटने के स्थान पर अपने लाभांश का एक हिस्सा ग्रामीण इलाकों में पशुपालन और कुटीर उद्योग लगाने में निवेश करें। इससे उन्हें तो लाभ होगा ही साथ ही साथ एसे कामो में वे लोग भी रुचि दिखाएंगे जिनसे उन्हें भी लाभ होगा।
फिलहाल हमारे देश में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है। देश के लिए यह समस्या और भी जटिल है। वर्त्तमान समय में देश की एक तिहाई आबादी 35 वर्ष या इससे भी कम उम्र वालों नौजवानों की है। देश में वर्त्तमान समय में जिस तरह से असंगठित क्षेत्रो के उद्योगों में ऑटोमेशन बढ़ रहा वहीं पर असंगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर के घटते चले जाने से भविष्य के आने वाले दिनों में और भी कम लोगों को देश में  रोजगार मिल पायेगा। विनिर्माण जैसे क्षेत्र लोगों को सबसे ज्यादा रोजगार दे सकता है, लेकिन निजी निवेश न होने के कारण इस क्षेत्र का विकास बहुत मद्धिम गति से हो रहा है या फिलहाल ठहरा हुआ सा प्रतीत हो रहा है, वही पर कौशल विकास ऐसा क्षेत्र है जिसमें पिछले साढ़े तीन साल में अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है।
देश के रेलवे जैसी संस्था में एक लाख साठ हजार पद खाली पड़े होने के वाबजूद इन पदों पर भर्ती क्यों नहीं हो पा रही है? भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में सत्ता में मौजूद रहने पर भी वहां पर पुलिस में बड़ी संख्या में खाली पदों को भरने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। इस सबों के अतिरिक्त केंद्र एवं राज्य के विभिन्न उपक्रमों में खाली पड़े पदों को नहीं भरने से दिनों दिन बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली जा रही है।
सरकार के पास अब भी पर्याप्त समय है, कि वह युद्ध स्तर पर इन सभी खाली जगहों को भरे। इससे देश में एक सकारात्मक माहौल बनेगा। वर्त्तमान समय में मोदी के लिए यह एक बात उनके पक्ष में है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी उनके लिए कोई बड़ी राजनीतिक चुनौती मौजूद नहीं है। राहुल गांधी का नव अवतार गुजरात में कांग्रेस को सत्ता नहीं दिला पाया। लेकिन अब यह देखना है कि वह कर्नाटक में अपनी सत्ता बचा पते हैं या नही?
जी के चक्रवर्ती, लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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