ग़ज़ल के चंद शेर-
काश टूटें भी दायरों के दिन,
याद आते हैं अब परों के दिन।
आइने को बचाए फिरते हैं ,
घर में मेहमां हैं पत्थरों के दिन।
ये शहर वारदात होते ही ,
ओढ़ लेता है चादरों के दिन
पंछी का उड़ जाना देख
ख़ुद को देख ज़माना देख,
रिश्तों का बलखाना देख।
पिंजरे की मायूसी देख,
पंछी का उड़ जाना देख।
सच कहने का यह अंजाम,
रूठा हुआ ज़माना देख।
पूछ न ये जीवन क्या है,
ग़म आना ग़म जाना देख ।
अब तो घर भी कहता है,
कोई और ठिकाना देख।
दुनिया है दिल वालों की,
दुनिया का बहलाना देख।
ज़ंजीरों में जकड़े लोग
अच्छे ख़ासे तगड़े लोग,
मन के लूले लँगड़े लोग।
सोच रहे जग का उद्धार,
ज़ंजीरों में जकड़े लोग।
नाटक है समरसता का,
खेलें अगड़े -पिछड़े लोग।
रखते नींव तरक्की की,
अपनी जड़ से उखड़े लोग।
-चन्द्रमणि त्रिपाठी







