सुंदर ! सुंदर !
शिव शिव के स्थान पर मैं चाहे जितना रट लूँ,
सत्य यह है कि
सुंदर इधर कुछ है नहीं।
कई मोर्चे खुले हुए हैं—
बेहद असुंदर और व्यर्थ
ज़िम्मेदारियों और जवाबदेहियों से भरे हुए—
इनमें रोज़ सुबह एक तय वक़्त पर घर से निकलना
और रात किसी भी वक़्त तक सुरक्षित लौट आने का मोर्चा भी है।
मैंने सारे मोर्चे
एक सफ़ेद काग़ज़ पर नीली स्याही से लिखकर
क़मीज़ की जेब में रखे हुए हैं,
सुंदरता के लिए जगह नहीं है।
- अविनाश मिश्र







