व्यंग: अंशुमाली रस्तोगी
अक्सर रात में मुझे भूतों के दिलकश सपने आते हैं। लगता मैं भूतों के बीच ही हूं। उनसे बातें कर रहा हूं। वे मुझसे गप्पे लड़ा रहे हैं। ये वो भूत नहीं होते, जो अक्सर फिल्मों और किस्से-कहानियों में सुनने को मिलते हैं। ये भूत कुछ अलग किस्म के होते।
भूतों के साथ कुछ देर सपनों में रहकर जान पाया कि वे दरअसल वो नहीं होते, हमने जो उन्हें बना दिया है। वे वो हैं, जैसा आम इंसान होता है। फर्क बस इतना है कि वे भूत हैं और हम इंसान। वैसे, मैं इंसानों को भूत से कम नहीं मानता। भूत इंसानों से फिर भी बेहतर होते हैं।
रात में मुझे भूत कहीं भी चलते, हंसते, खेलते दिख जाते हैं। एक दिन तो अहसास हुआ कि भूत मेरे कमरे के बाहर जाल पर टहल रहा है। बस उसकी पूंछ नजर आती। कभी-कभार एक आंख भी दिख जाती। भूत काले कपड़ों में नहीं, रंग-बिरंगे कपड़ों में नजर आते। वे मुझे देख मुस्कुरा रहे होते।
मैं जब किसी भूत से बात करता मुझे आत्मिक शांति मिलती। लगता कोई अपना बात कर रहा है। मैं उनसे उनके भूत बनने की प्रक्रिया पूछता, वे बताते। इंसानों से उन्हें बड़ी शिकायतें रहतीं। कहते- दुनिया में उन्हें जितना बदनाम इंसानों ने किया, किसी और ने नहीं।
जबकि, यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं, भूतों जितना वैचारिक जीव मैंने न कहीं देखा न सुना। भूतों के आगे बुद्धिजीवी भी फेल हैं। भूत प्रोगेसिव होते हैं। न अपने विचार किसी पर थोपते न किसी के विचार खुद पर लादते। एकदम स्वतंत्र रहते।
मेरे विचार में, भूतों के प्रति अपनी सोच हमें बदलनी होगी। वहां-वहां की सैर एक दफा जरूर करनी होगी, जहां-जहां भूत पाए जाते हैं। भूतों से यारी जरूरी है। पर इसके लिए हिम्मत चाहिए। मैं भूतों से सपनों के अलावा वास्तविकता में भी मिलना चाहूंगा। आगे वे मिल पाए तो।







