Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 516 आपके विचार: हे किसान! तुम सह रहे, धूप, शीत, बरसात, फिर भी कोई न पूछता, तुमसे दिल की बात, नेता और बिचौलिये मोहरा तुम्हें बनाएं, चौसर खेलें लाभ का तुम्हें मिले नित घात।। -अरविंद कुमार साहू
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन