अचानक एक दिन मेरा ध्यान एक ऐसे आदमी पर गया
जो सड़क पर टहल रहा था। वह जाता था, लौटता था,
रात का वक़्त का था।
धीरे-धीरे मुझे लगा : उसकी नज़र मेरे घर पर है
मैं डरा। अंदर गया। पानी पिया। और फिर खिड़की के पास आ गया।
वह आदमी उसी तरह टहलता रहा : यह पहले दिन का ज़िक्र है।
उसके बाद वह आदमी कभी नहीं दिखा लेकिन
वह मुझे एक ऐसे आदमी की तरह याद है जो
मेरे घर के सामने संदेहास्पद तरीक़े से घूमा
जिसने खिड़की से झाँक कर घर की टोह ली
जो शायद मेरे घर में घुसना चाहता था।
जो पता नहीं क्या कहना चाहता था : तो क्या मुझे वह मार देना चाहता था।
मैं नहीं कहता कि यह असंभव है कि उस वक़्त
मेरे घर में बजता संगीत उसे अच्छा लगा हो
कि वह घर के भीतर टँगी पेंटिंग को देखने की कोशिश करता रहा हो
कि वह किसी दोस्त का घर खोजता रहा हो
लेकिन रात को दिखा वह आदमी आज मुझे
एक संदिग्ध आदमी की तरह ही याद है
बंधुओ ! इस सभ्यता में हम या तो संदेह करते हैं
या संदेहास्पद होते हैं।
◆ देवी प्रसाद मिश्र , संदेह, से







