बाजा बजाकर ही दम लूँगा मैं
फिर मुस्कुराकर ही दम लूँगा मैं
तू जो समन्दर है तो भी ग़म क्या
तुमको सुखाकर ही दम लूँगा मैं
हरदम सताया है तुमने सबको
अब तो रुलाकर ही दम लूँगा मैं
ताण्डव करूँगा तेरे सर पर चढ़
तुमको झुकाकर ही दम लूँगा मैं
पट्टा गले तेरे डालूँगा अब
कुत्ता बनाकर ही दम लूँगा मैं
अब तो ये ज़िद है मेरी वो कायर
तुमको मिटाकर ही दम लूँगा मैं
- कवि शिव निश्चिंत की वॉल से







