सरकारें निज स्वार्थ को बनती हैं, उनको मलाई खाने दो।
अपने हरे ज़ख्मों को लेकर क्यों उनसे फ़रियाद करते हो।
क्यों अपने प्रिय मेहनतकश नेताओं का समय बर्बाद करते हो।
अब प्रशासन से क्यों उम्मीद करते हो, ये तो बहुत पढ़-लिख कर आते हैं।
इन सीधे-सीधे बेचारों को निज स्वार्थ की चाकरी करने दो।
समाज में भय हो, अशांति हो, अपराध बढ़ें तो क्या?
बेटियों की दुर्दशा पर दु:शासन हर रोज हंसे तो क्या?
अपने साहबों की जय बोलो और मानव होने के गुण खो दो।
रूह कंपाने वाली घटनाओं पे बस पोस्ट कर भड़ास निकाल लो।
फिर शांति पकड़ कर सिर्फ नयी घटनाओं का इंतजार करो।
कल किसकी बारी होगी? बस अब अपनी बारी का इंतजार करो।
इस गंधेले समाज के लिए भूले से न हथियार उठाओ न प्रतिकार करो।
अपने हरे ज़ख्मों को लेकर क्यों उनसे फ़रियाद करते हो।
क्यों अपने प्रिय मेहनतकश नेताओं का समय बर्बाद करते हो।
अब प्रशासन से क्यों उम्मीद करते हो, ये तो बहुत पढ़-लिख कर आते हैं।
इन सीधे-सीधे बेचारों को निज स्वार्थ की चाकरी करने दो।
समाज में भय हो, अशांति हो, अपराध बढ़ें तो क्या?
बेटियों की दुर्दशा पर दु:शासन हर रोज हंसे तो क्या?
अपने साहबों की जय बोलो और मानव होने के गुण खो दो।
रूह कंपाने वाली घटनाओं पे बस पोस्ट कर भड़ास निकाल लो।
फिर शांति पकड़ कर सिर्फ नयी घटनाओं का इंतजार करो।
कल किसकी बारी होगी? बस अब अपनी बारी का इंतजार करो।
इस गंधेले समाज के लिए भूले से न हथियार उठाओ न प्रतिकार करो।
-राहुल कुमार गुप्त







