अब वो कुछ कम मिलते हैं
अब वो हमसे कुछ कम मिलते हैं
कुछ क्या, बहुत कम मिलते हैं
वो कहते हैं कि बहुत हो लिया मिलना मिलाना
तुमारे शहर में दगाबाजियां बहुत हैं
अब वो किसी और से मिलते हैं
कहते हैं, तुम ही तो चलने को कहते थे
अब उनकी कविता भी बदल गयी है
शब्द बेतरतीब हैं, या मुझे ही ऐसा लगता है
वो अब कम बोलते भी हैं
खामोशी को ही समझना होगा
अब हम दोनों ही कुछ कम मिलते हैं
कम क्या, बहुत कम मिलते हैं…।
- नीरज







