ग़ज़ल संग्रह: प्यास बुझती नहीं समन्दर से एक ग़ज़ल के चंद शेर:
आस्तीं में सांप पाले जा रहे हैं,
आप क्यों घर से निकाले जा रहे हैं।
क्या ये कम है लोग पत्थर के शहर में,
आईने अपने बचा ले जा रहे हैं।
कारवाँ मंज़िल पे पहुँचा इस ख़ता में,
मील के पत्थर निकाले जा रहे हैं।
ये भी देखिए:
अब उन्हें भी दिल लगाना आ गया है,
देखिए तो क्या ज़माना आ गया है!
क्या ज़माना है, चुराते थे जो दिल,
अब उन्हें नज़रें चुराना आ गया है।

ग़ज़ल के चंद शेर : अच्छे ख़ासे तगड़े लोग
अच्छे ख़ासे तगड़े लोग,
मन के लूले – लंगड़े लोग।
सोच रहे जग का उद्धार,
ज़जीरों में जकड़े लोग।
नाटक है समरसता का,
खेलें अगड़े – पिछड़े लोग।
रखते नींव तरक्की की,
अपनी जड़ से उखड़े लोग।
दो शेर-
अब तक उसी माहौल में पाले गए हैं लोग,
जिसमें नहीं थीं खिड़कियां, दरवाज़ा नहीं था।
कुछ उनके मुंह का ज़ायका बिगड़ा हुआ है आज,
लगता है ग़रीबों का लहू ताज़ा नहीं था।
– चन्द्रमणि त्रिपाठी







