ओ गँवारिन पनिहारिन!
जब गागर भरने की वेला थी
तब तो तू सोयी रही,
रंगीन सपनों में खोयी रही,
और अब जब प्रिय की बाँहों में समाने की घड़ी आयी है,
तेरे मन में गागर भरने की धुन समाई है..!!
वही चाँद है, वही गगन है
इसी कदम्ब तले
कभी राधिका और श्याम दिखते थे गले-गले !
यमुना वही, वही मधुवन है
वही चाँद है, वही गगन है
किन्तु गूँजता झिल्ली स्वप्न है
वंशी के बदले..!!
- गुलाब खंडेलवाल, काव्य कृति से







