मंगलवार की आधीरात जब हममें से बहुत सारे लोग सो रहे थे तभी हिन्दी आलोचना के शीर्ष व्यक्तित्व नामवर सिंह हमेशा के लिए जग से ओझल हो गये। वे एम्स में दूसरी बार भर्ती हुए थे, पर इस बार घर वापसी नहीं हो पायी। 93 साल की लम्बी उम्र और हिन्दी साहित्य के परिसर में लम्बी लड़ाई को हमेशा फतह करने वाले अदम्य साहसी नामवर सिंह मंगलवार को अस्पताल के बिस्तरे पर काल के सामने नतशिर हो गये। उनके अवसान के साथ हिन्दी साहित्य में आज एक खास आलोचक युग का अंत हो गया।
हिंदी जगत के प्रख्यात साहित्यकार व आलोचक नामवर सिंह सादा जीवन उच्च विचार के धनी व्यक्ति थे। जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सामज को एक नई दिशा देने में लगा दिया। मूलत: धानापुर विकास खंड के जीयनपुर गांव निवासी नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1926 में हुआ था। उनके पिता नागर सिंह एक शिक्षक थे जिन्होंने कक्षा आठ तक नामवर सिंह को अपने साथ विद्यालय ले जाते थे उनकी प्रथमिक शिक्षा माधोपुर और कमालपुर से प्राथमिक शिक्षा पूरी हुई। उन्होंने हाई स्कूल और इंटर की शिक्षा यू पी कॉलेज से और उच्च शिक्षा बनारस हिंदू यूनिर्वसटिी से पूरा किया।
उनके विचार शुरू से ही नास्तिक रहे है वह धार्मिंक कुरीतियों से हमेशा दूर रहे। उन्होंने गांव में स्वास्य केंद्र खोलने के लिए उन्होंने अपनी और अपने परिवार की जमीन दान में दे दी। आखिरी बार वह लगभग दस साल पूर्व शाहीदगांव अमर शहीद इंटर कॉलेज में रखे गए अभिन्नदन समारोह में आये हुए थे। जिसमेँ क्षेत्र के लोगो ने उनके सम्मान में उन्हें फूलों से ढक दिया था। 1951 में उन्होंने हिन्दू विविद्यालय से एम ए करने के दो साल बाद वहीं हिंदी के व्याख्याता नियुक्त हो गए। कम्युनिस्ट पार्टी से प्रभावित होकर उन्होंने 1959 में कम्युनिस्ट पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ा था जिसमे वह हर गए जिसको लेकर उन्हें बीएचयू से नौकरी छोड़नी पड़ी थी। उनके बाद वह सागर विविद्यालय में नौकरी किया और 1960 में फिर वाराणसी वापस आ गए। 1974 में वह दिल्ली चले गये जहां जवाहर लाल नेहरू विविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए और वहीं से 1987 में सेवा मुक्त हुए और वहीं राह गए।
दशहरे देखने मित्रों के साथ जाते थे:
नामवर सिंह का हमेशा से गांव से लगाव था जब तक वह बनारस में थे उनका गांव पर आना जाना लगा रहता था। उनके भतीजे जयप्रकाश सिंह ने बताया कि दशहरा के दिन वह गांव जरूर आते और मेल देखने मित्रो और गांव के लोगो के साथ जाते और सभी को खुश रखते थे।
जामवंत के पान सुहावे :
परिजनों ने बताया कि वह गांव घर के वार्तालाप में भी अपनी साहित्य और हिंदी की छाप छोड़ देते थे लोगों ने बताया कि एक बार घर मे शादी समारोह के दौरान उनके भाई ने जामवंत नौकर द्वारा पान देने पर कहा कि जामवंत के वचन सुहावे जिसपर उन्होंने तुरंत कहा कि वचन नहीं जामवंत के पान सुहावे।
मनई करते हैं घर की रखवाली :
गांव में उनके पुस्तैनी मकान पर कोई रहने वाला नही है उनके घर को प्रहलादपुर निवासी मनई कुशवाहा और उनकी पत्नी बेला देवी विगत 50 सालों से रहकर देख भाल करती है और उनके यादों को संभाल कर रखी हैं। उनका कहना है कि जब भी वह घर आते उसी सादगी भरी जीवन के साथ रहते जो गांव के लोग भी उस सादगी से नही रहते। उनका विचार और ऊंची सोच आजीवन हमें याद रहेगा।
कक्षा आठ में हो गए थे फेल :
मीडिया ख़बरों के अनुसार नामवर सिंह अपने पूरे शिक्षा काल मे अव्वल आते थे यहां तक कि उन्होंने स्कालरशिप की परीक्षा पास किया था और उस समय उन्हें सरकार द्वारा स्कालरशिप मिलती थी। बावजूद वह कक्षा आठ की परीक्षा में फेल हो गए थे । उनके भतीजे जयप्रकाश सिंह, नाती बंशनरायन सिंह प्रसिद्धनरायन सिंह, ने बताया कि उनके पिता एक शिक्षक थे जिन्होंने अपने साथ उन्हें जिस विद्यालय पर रहे उस विद्यालय में अपने साथ ले गये। यहाँ तक कि स्कूल आते जाते और सोते बैठते भी उन्हें पढ़ाते ही रहते।
निधन पर उमड़ा हुजूम:
प्रात: नामवर सिंह के निधन की सूचना पर गांव और क्षेत्र के लोगो का उनके दरवाजे पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालो का तांता लगा रहा। लोगो ने कहा कि उनके चले जाने से क्षेत्र ने एक और धरोहर को खो दिया है।







