केशर की, कलि की पिचकारी !
पात-पात की गात सँवारी।
राग-पराग-कपोल किए हैं,
लाल-गुलाल अमोल लिए हैं
तरू-तरू के तन खोल दिए हैं,
जो चपेट में आ गया , उसका बंटाधार
होली की मस्ती चढ़ी, झूम रही सरकार।
जो चपेट में आ गया , उसका बंटाधार।।
उसका बंटाधार, न देखे कभी उजाला,
घूमे पूरे साल, लिये अपना मुंह काला,
हटो – बचो का शोर, भंग की खाकर गोली।
मस्त – मस्त सरकार, झूमकर खेले होली।। – चन्द्रमणि त्रिपाठी
रंग दें हम सारा संसार
आओ होली में इस बार
रंग दें हम सारा संसार
मानवता का रंग जिसमें
ऐसा रंग बिखेरेंगे
सद्भभावो वाली होली
चलो न अबके खेलेंगे
होरी है!! होरी!!!
होली को रंग मची हुरदंग, छकावत कान्ह औ भागत गोरी,
गोरी हजार करै विनती, बस हारी मैं मोहि रहै दे रे कोरी,
कोरी सी गोरी को बांह मरोरि औ छोरि लै कान्ह अबीर को झोरी,
झोरी अबीर को डारि दई कह,होरी है! होरी है!!
होरी है!! होरी!!!- चन्द्रमणि त्रिपाठी







