एक बार कि बात हैं कुछ नौजवान साथ-साथ कहीं जा रहे थे। गर्मी के दिन थे। बड़ी तेज धूप पड़ रही थी। सबके शरीर से पसीना बह रहा था। लेकिन उन्हें गंतव्य स्थान पर पहुंचने की जल्दी थी। इसलिए वे रुक भी नहीं सकते थे। चलते-चलते उनमें से एक को बड़े जोर की प्यास लगी। उसने साथियों से कहा, “कहीं थोड़ा पानी मिल जाता। मारे प्यास के गला सूख रहा है, जान निकली जा रही है।”
सबने इधर देखा, उधर देखा, किन्तु दूर-दूर तक पानी का आसार नजर नहीं आया। थोड़ा और आगे बढ़े। प्यासे युवक ने कहा, “अब मुझसे चला नहीं जाता। प्राण गले में आ गये हैं।”
सबने मिलकर चारों ओर निगाह दौड़ाई। अचानक उन्हें कुछ दूरी पर हरियाली दिखाई दी। एक ने कहा, “हो-न-हो, वहां पानी अवश्य होगा। बिना पानी के इतनी हरियाली हो नहीं सकती।”
आशा से उनके पैरों में गति आ गई। वे लोग उधर ही बढ़े। उनके आनंद का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने पास जाकर देखा कि पेड़ो के झुरमुट के बीच एक कुआं है। प्यासे युवक के खोये प्राण लौट आये। सबने चैन की सांस ली। संयोग से कुएं में से पानी निकालने के लिए उन्हें एक डोल और रस्सी भी मिल गई। बड़ी तत्परता से उन्होंने छोल को रस्सी में बाधां और उसे कुएं में फांस दिया। पानी बड़ा गहरा था, पर रस्सी भी लम्बी थी। डोल पानी तक पहुंच गया। उन्होंने उसमें पानी भरा और ऊपर खींचने लगे। प्यासा युवक बड़ी उत्सुकता से डोल के ऊपर आने की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ ही देर में डोल ऊपर आ गया, लेकिन यह क्या? उसमें पानी की एक बूंद भी नहीं थी। आश्चर्य से उन्होंने डोल को देखा। उसकी पैंदी में चार छेद थे। बेचारा युवक प्यासे-का-प्यासा रह गया।
कहानी प्रतीकात्मक है। हम सबकी हालत उस नवयुवक जैसी है। हम सब प्यासे हैं। हमारे पास घट है, किन्तु पानी टिके भी कैसे? उसमें चार छेद हैं काम, क्रोध, लोभ और मोह के। जबतक ये छेद रहेंगे, हम जीवन में भटकते रहेंगे।








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