पहाड़-3
पहाड़ को रोते
किसी ने नहीं देखा
लेकिन बिना किसी को खबर किये
कितना रिसता है पहाड़
भीतर-ही-भीतर, कि
इकट्ठी कर लेता है
आंसुओं की झील!

पहाड़-4
पहाड़ के हृदय-ताल पर
नौका-विहार करते हुए, जब
मैंने ऊपर देखा तो
पहाड़ मुस्करा रहा था
सदियों से
आदमी के हर प्रहार को
सहते आ रहे
पहाड़ की उदारता देखकर
शर्म से पानी-पानी हो गया मैं.
पहाड़-5
घोड़ों की टापों के साथ
पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचकर
रूई के फाहों में लिपटा नैनीताल
बहुत सुंदर लगता है
सच्च! ऊंचाईयां छिपा लेतीं हैं
यहां की गरीबी.. अभावों.. और
तकलीफ़ों का भद्दापन.
पहाड़-6
जब बारिश होती है
पहाड़ बुलाते हैं
पहन लेते हैं हरे परिधान
उनकी कठोरता में आ जाती है नमी
फूटने लगते हैं झरने उनकी कोख से
उनकी चोटियों पर बादल करते हैं अठखेलियां
सरसराती हवा सशरीर टहलने लगती है चट्टानों पर
जब हम जीवन में रसहीन एकाकी हो जाते हैं
पहाड़ बुलाते हैं
अपने साथ भीगने के लिए
बारिश में.
पहाड़-7
पहाड़ पर जाते ही
समझ में आ जाता है जीवन
जिजीविषा, संयम, कठोरता और
बर्दाश्त कर पाने की अपराजेय क्षमता से
होते हैं रू-ब-रू
लौट तो आते हैं हम पहाड़ से
लेकिन चला आता है पहाड़ संग-संग हमारे.
– आनंद अभिषेक







