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    Home»साहित्य

    तुम्हारा नाम क्या है बसंती ?

    ShagunBy ShagunSeptember 1, 2020 साहित्य No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 654
    व्यंग्य: के के अस्थाना
    कल एक खबर पर टीवी का एंकर उत्साह के मारे स्क्रीन से बाहर कूदा पड़ रहा था कि ‘फिल्म इंडस्ट्री की पार्टियों में ड्रग्स लिये जाने का बड़ा खुलासा !’ उसने एक और खुलासा किया कि ‘फिल्मो में लगते हैं अंडरवर्ल्ड के पैसे !’ एंकर ने बहुत बड़ा खुलासा करके पत्रकारिता के क्षेत्र में झंडे गाड़ दिए. इससे पहले किसी को पता थोड़े ही था कि फिल्मों में किसके पैसे लगते हैं. और न यह पता था कि बिगडैल रईसजादों और नव धनाढ्यों की फ़िल्मी पार्टियों में होता क्या है ! उसने बसंती से पूछ लिया, ’तुम्हारा नाम क्या है बसंती ?’ और खुश होकर चिल्लाया कि पहली बार सुना यह नाम! एंकर का उत्साह देखने लायक था.
    “तुम्हारा नाम क्या है बसंती ?” जैसे प्रश्न राजनीति और ख़बरों की दुनिया में आम हैं. अक्सर पूछे जाते रहे हैं. और हमारे भोले भाले दर्शक “पहली बार सुना यह नाम !” की तर्ज पर प्रसन्न होते रहते हैं. टीवी एंकर ऐसे उत्साह से खबर सुनाते हैं कि सुनने वाला एक बार को सोच में पड़ जाता है कि क्या यह खबर वास्तव में पहली बार सुन रहा हूँ.
    “ट्रक वालों से वसूली करता पकड़ा गया सिपाही” इतने उत्साह के साथ चिल्ला चिल्ला कर टीवी एंकर यह खबर सुनाता है कि सुनने वाला भ्रम में पड़ जाता है कि क्या इससे पहले ऐसा नहीं होता था? क्या वास्तव में चौराहे पर पुलिस वाले ने आज पहली बार ट्रक वाले से वसूली की है ! इतने उत्साह से सुनाई गयी खबर पर कहने को मन होने लगता है कि पहली बार सुनी यह खबर. पहली बार सुना यह नाम, बसंती !!
    इस मामले में टीवी के एंकर की समस्या बिलकुल मंच के कवियों जैसी है. दोनों को ही अपने दर्शकों की अटेंशन चाहिए. उसके लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा. आलोचक उसे हथकंडे और जाने क्या क्या उल्टा सीधा कहते हैं, तो कहते रहें. शराफत से न्यूज पढो तो लोग दूरदर्शन समझ कर आगे बढ़ जाते हैं. इसलिए चिल्लाना पड़ता है. कवि भी सिर्फ कविता पढ़े तो लोग आपस में बातें करने लगते हैं. उन्हें व्यस्त रखना कितना मुश्किल है, यह बात या तो मंच का कवि जानता है या फिर टीवी का एंकर. दोनों को ही रोज एक ही जैसी बातों से श्रोताओं को एंगेज रखना पड़ता है. रोज रोज ना तो नयी कविता हो सकती है ना नयी खबर.
    कवि के सामने भी सीमित विषय हैं. श्रृंगार का कवि है तो एक अदद प्रेमिका, उसके उलझे बाल या गालों पर लटकती लट, झील सी गहरी आँखें, कभी मिलना तो कभी बिछुड़ना और ज्यादा से ज्यादा जालिम जमाना, बस. इतने पर सदियों से कवितायें लिखी जा रही हैं. कोई नया लिखे भी तो क्या लिखे. वीर रस का कवि है तो विकल्प और भी कम हैं. एक पाकिस्तान पर कितने कवि कितनी कवितायेँ लिखते रह सकते हैं. फिर भी कवि को उसी कविता को किसी तरह मौलिक दिखाने के लिए नयी शक्ल में पेश करना होता है. इसी तरह एंकर को सदियों से वही हत्या, लूट, आतंकवाद, पाकिस्तान और दल बदल की चार पांच तरह की ख़बरें ही तो सुनानी होती हैं. श्रोताओं और दर्शकों को कैसे व्यस्त रखे. इसीलिए चिल्लाना पड़ता है. कभी कभी बड़े भाग्य से कोई सनसनीखेज हत्या वगैरह का मामला हाथ आता है.
    अपने यहाँ समाज में समानता आई हो या न आई हो पर टीवी पर बराबरी इतनी ज्यादा आ गयी है कि समाचार और मनोरंजक कार्यक्रमों में कोई अंतर ही नहीं बचा है. समाचारों को कोई गंभीरता से ले भी तो कैसे ले. दर्शक भी जब कोई अच्छा प्रोग्राम न आ रहा ओ तो न्यूज़ लगा लेते हैं. समाचार भी वैसे ही सुने जाते हैं जैसे लाफ्टर शो देखे जाते हैं. टीवी चालू है, लोग बातें कर रहे हैं. एंकर समाचार सुनाये जा रहा है. दोस्त लोग गपशप में मशगूल हैं. अब ऐसे में उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए एंकर बेचारा क्या करे. चिल्ला कर ही तो उनका ध्यान अपनी और कर सकता है. वही करता है.
    समस्या और बड़ी हो जाती है जब टीवी चैनेल के कॉम्पटीशन में बीवी आ जाती है. वह मोहल्ले की ख़बरें सुनाने लगती है. अब प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय और मोहल्ला स्तर के समाचारों के बीच हो जाती है. एंकर का कर्त्तव्य बनता है कि वह राष्ट्रीय महत्व को ऊपर रखे. यही कारण है कि उस बेचारे को चिल्लाना पड़ता है. अपने लिए नहीं, खबर के लिए चिल्लाना पड़ता है. राष्ट्र के लिए चिल्लाना पड़ता है. लोग समझते ही नहीं !
    दूरदर्शन अभी तक शराफत से समाचार सुनाता है . शालीन परिचर्चा करता है. तभी तो कोई दूरदर्शन की सुनता नहीं है. जितना ही घर के बड़े बूढों की तरह अपनी बात कहने की कोशिश करता है, नयी पीढ़ी उतना ही उसे पुराने जमाने का मान कर अनदेखी करती रहती है. वैसे दूरदर्शन का हाल है भी दादाजी वाला ही. दुनिया इधर से उधर हो जाए पर उसका अपना प्रोग्राम इधर से उधर नहीं हो सकता. दुनिया में चाहे जितनी बड़ी घटना घट रही हो. सारे चैनलों के एंकर गला फाड़ फाड़ कर न्यूज़ सुना रहे हों. पर हमारा दूरदर्शन नियत समय हो जाने पर कृषि दर्शन सुनाने को व्याकुल हो जाता है. वह जब तक ‘घर की छत पर सब्जी कैसे उगायें’ पर वार्ता नहीं कर लेता, उसे चैन नहीं आता है.
    कई बार तो विश्व की घटनाएं रास्ता देखती हैं कि दूर दर्शन का ‘कम्पोस्ट की खाद बनाने की विधि’ वाला कार्यक्रम ख़त्म हो जाए तो घटें. खबर को भी अपनी इज्जत प्यारी होती है आखिर. पता चला कि रिक्टर स्केल पर सात की तीव्रता वाला भूकंप आने वाला है, पर दूरदर्शन पर ‘आजकल के साहित्यिक परिदृश्य पर एक परिचर्चा’ चल रही है. दूरदर्शन उसे बंद करके तो भूकंप की खबर तो सुनाएगा नहीं. इसलिए भूकंप थोडा ठहर कर आता है, ताकि दूरदर्शन भी इसे थोडा महत्व दे सके.
    जबकि प्राइवेट चनेलों को इस गला काट प्रतिस्पर्धा में सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज़ देने के लिए कभी कभी समय से पहले भूकंप लाने का इंतजाम भी करना पड़ता है. बसंती को कैमरे पर लाने से पहले उसे पूरी बात बतानी पड़ती है. अचानक पूछने से वह हडबडा सकती है. इसलिए पूरी बात समझानी पड़ती है. इस तरह समझा बुझा कर पूछना पड़ता है कि ‘तुम्हारा नाम क्या है बसंती ?’
    और दर्शक उनके तरह तरह के नारों जैसे कि सबसे तेज, सबसे आगे, जहाँ हम वहां खबर, खबर दे भी और खबर ले भी, रखे आपको आगे, समाचार भी विचार भी, खबर वही जो हम दिखलायें, जानने का हक, सबसे पहले जानने का हक और घटना से पहले जानने का हक वगैरह से प्रभावित होकर मान लेता है कि ‘पहली बार सुना यह नाम, बसंती !’ – के के अस्थाना की वॉल से से साभार

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