संस्कृत में सार्थक हुई चरैवेति चरैवेति

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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की चर्चित पुस्तक संस्कृत में अनुवाद के बिना अधूरी थी। क्योंकि यह शब्द मूलतः संस्कृत साहित्य के है। इनके पीछे संपूर्ण जीवन दर्शन छिपा है। प्रत्येक व्यक्ति इससे प्रेरणा ले सकता है। राम नाईक ने अपने जीवन में चरैवेति चरैवेति पर अमल किया। उम्र के इस पड़ाव पर उनकी यह यात्रा जारी है। इसमें प्रेरणा के तत्व है। संस्कृत के अथाह साहित्य में इस आधुनिक पुस्तक की भी गणना होगी। जीवन चरैवेति चरैवेति  कैसे होता है, इसका भाव जागृत होता है। राम नाईक ने पुस्तक के प्रारंभ में ही इन सूक्तियों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा-प्राचीन वांग्मय की सूक्तियों में जीवन के लिए उपयुक्त दर्शन बताया गया है। ऐतरेय की सूक्तियों में एक जगह उल्लेख है कि एक राजा को आत्मोन्नति का बोध करने हेतु इंद्र देवता ने मनुष्य का रूप धारण किया था। अच्छे भाग्य का अधिकारी बनने के लिए सतत चलते रहने का उपदेश देते हुए इंद्र कहते है –
आस्ते भग आसिनस्य
ऊर्ध्वंम तिष्ठति तिष्ठतः
शेते  निपद्य  मानस्य
चराति चरतो भग:!
चरैवेति चरैवेति!!
बैठे हुए व्यक्ति का भाग्य बैठ जाता है।
खड़े हुए व्यक्ति का भाग्य वृद्धि की ओर उन्मुख होता है।
सो रहे व्यक्ति का भाग्य भी सो जाता है
किन्तु चलने वाले व्यक्ति का भाग्य प्रतिदिन बढ़ता जाता है,
अतः तुम चलते रहो !चलते रहो!!
उदहारण के रूप में इंद्र  आगे ,
बताते है,
चरनवो  मधुविन्दति
चरनस्वा दुमुदुम्बरम
सूर्यस्यपश्य  श्रेमाण
यो न तन्द्रयते चरश
चरैवेति ! चरैवेति!!
मधु मक्खियां घूम घूम कर शहद जमा करती है
पक्षी  मीठे फल खाने के लिए सदा भृमण करते है
सूरज कभी सोता नहीं
चलता रहता है
इसलिए जगतवन्दनीय है
अतः है मानव तुम भी
चलते रहो! चलते रहो !!
इस उल्लेख के बाद राम नाईक ने अपने  संस्करण का वर्णन किया है। उनका प्रत्येक लेख चरैवेति चरैवेति को ही चरितार्थ करते है। ये लेख उन्होंने मराठी साकाळ समाचार पत्र में प्रकाशित हुए थे। राम नाईक के अलावा महाराष्ट्र के दो पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार, मनोहर जोशी, और सुशील कुमार शिंदे के भी लेख प्रकाशित हुए थे।
इसमें राम नाईक ने प्रारंभिक जीवन के अलावा अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की प्रमुख घटनाओं  का उल्लेख  किया है।  अपने लिये  घर की तलाश में भी चरैवेति चरैवेति झलकता है। दर्जनों मकान बदलने के बाद सोसायटी के एक मकान नसीब हुआ। इसके बारे में राम नाईक लिखते है कि राजभवन के स्नानागार मुम्बई के घर के कमरों से बड़े है।  लेकिन ये भी उन्हें कार्य करने की प्रेरणा देता है। इसमें इनकी आसक्ति नहीं है। उन्हें लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है। तीन बार विधायक, पांच बार  लोकसभा सदस्य, केंद्र में  रेल राज्य मंत्री, पेट्रोलियम विभाग में कैबिनेट मंत्री रहे। यह पेट्रोलियम क्षेत्र का स्वर्ण युग था।
अब इसका न केवल संस्कृत में अनुवाद हुआ, बल्कि इसका लोकार्पण भी बहुत गरिमापूर्ण रहा। इसके लिए भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद स्वयं काशी आये। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के साथ उन्होंने  चरैवेति चरैवेति के सस्कृत  संस्करण का लोकार्पण किया। इस पुस्तक को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र द्वारा अनुवादित किया गया है। प्रस्तावना वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य डाॅ. कर्ण सिंह ने लिखी है।
राम नाईक के संस्मरणों पर आधारित मूल मराठी पुस्तक अब तक हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू एवं गुजराती भाषाओं में अनुवाद  हो चुका  है।
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मराठी भाषी संस्करण का विमोचन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस ने दो वर्ष पहले मुंबई में किया था।    इसके सात महीने बाद हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू तथा गुजराती संस्करणों का लोकार्पण राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में में किया गया। इसके कुछ दिन के अंतराल में लखनऊ के राजभवन और मुम्बई में लोकार्पण हुआ। शीघ्र ही राज्यपाल के संस्मरण संग्रह का बंगाली, सिंधी, तमिल सहित अरबी एवं फारसी भाषा में भी प्रकाशन किए जाने के प्रस्ताव प्राप्त हुए।
संस्कृत संस्करण के लोकार्पण समारोह में रामनाथ कोविंद, राम नाईक और योगी आदित्यनाथ ने चरैवेति ,चरैवेति को  रेखांकित किया। राम नाईक कहा कि निरन्तर कर्म करते रहने से ही जीवन में सफलता प्राप्त होती है। उन्हें संसद में राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ एवं राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन, सांसद निधि की शुरूआत कराने, मुंबई को उसका असली नाम दिलाने, मुंबई में दो तल के शौचालय बनवाने एवं महिलाओं के लिए किये गये कार्यों से बहुत समाधान है।   राष्ट्रपति  राम नाथ कोविन्द ने कहा कि श्री नाईक की पुस्तक ‘चरैवेति! चरैवेति!!’ निरन्तर गतिशील रहने का संदेश देती है। उनकी आत्मीयता, नेतृत्व क्षमता, कार्य कुशलता एक विशेष छाप छोड़ती हैं। उन्होंने कुष्ठ पीड़ितों, मछुआरों और महिलाओं के लिए बहुत कार्य किया है। मुंबई में पहली महिला ट्रेन का शुभारम्भ श्री नाईक द्वारा किया गया। वह सफलता और असफलता से प्रभावित हुए बिना निरन्तर कार्य करते हैं। योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि राम नाईक का जीवन अपने आप में चरैवेति चरैवेति की प्रेरणा देता है।
निश्चित ही इस पुस्तक का संस्कृत में अनुवाद सार्थक रहा। संस्कृति के धरातल पर इसका व्यापक विश्लेषण किया जा सकेगा। क्योकि इसमें केवल घटनाएं ही नहीं विचार, साधन और साध्य सभी प्रेरणा देने वाले है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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