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    Home»धर्म»Spirituality

    शिवभक्तों की शरण स्थली: कोणेश्वर महादेव मन्दिर चौक लखनऊ

    By August 7, 2018Updated:August 7, 2018 Spirituality No Comments7 Mins Read
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    हेमंत कुमार/ जी क़े चक्रवर्ती
    भगवान शिव शंकर आदि देवता है। वैदिक काल से पहले से ही भगवान शिव की आराधना की परंपरा चली आ रही है। भगवान शिव देव, असुर, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, नाग और मनुष्य सबके प्रिय आराध्य देवता हैं। उनके गणों में भूत, पिचास, तथा प्रेत आदि सभी सम्मिलित हैं। वास्तव में शिव जी प्रकृति के देवता है। जल, कच्चा दूध, भांग-धतूरा आदि कुछ भी उनको अर्पित करिये, वे स्वीकार कर लेते हैं। रुद्र रूप में वे संहार के देवता हैं तो शिव रूप में वे सबका कष्ट हरने वाले कल्यणकारी देवता हैं। वह आसन्न मृत्यु को भी टाल देने वाले मृत्युंजय काल की भी काल महाकाल हैं। इसलिए अपने भक्तों के बीच आशुतोष औघड़ दानी शंकर के रूप में लोकप्रिय हैं।
    शिव के रूप में महादेव अघोरी सन्यासी एवं श्मशान वासी हैं किंतु माता पार्वती के साथ विवाह हो जाने के पश्चात वह पारिवारिक व्यक्ति हो जाते हैं। अपने शंकर रुप में वह गणेश व कार्तिकेय के पिता व पार्वती जी के पति हैं। पुराणों के अनुसार वे कैलाशवासी हैं। काशी उनकी प्रिय नगरी है। महाकाल के रूप में उनका निवास श्मशान में है तो अपने सर्वव्यापी रूप में वे कंकर कंकर में विद्यमान है। हर पत्थर में भी वे लिंग रूप में विराजमान हैं। साल के बारह महीनों में सावन का महीना उनको अत्यंत प्रिय है। उसमें भी सोमवार का दिन उनको अत्यंत प्रिय है। सावन के महीने में भक्तजन शिवजी की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। सावन के महीने में कांवड़ियों कुंवारिये गंगा जी का जल भरकर प्रसिद्ध शिव मंदिर में जलाभिषेक करने आते हैं। लखनऊ में भी मनकामेश्वर भवरेश्वर, कोणेश्वर और सिद्धनाथ, महाकालेश्वर आदि प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं।
    महादेव जी की भी तंत्रोक साधना की जाती है और तंत्र के पूजा विधान में त्रिकोण का महत्वपूर्ण स्थान है। अयोध्या स्थित नागेश्वरनाथ मंदिर तथा महादेवा बाराबंकी स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर तथा चौक लखनऊ स्थित कोटेश्वर महादेव मंदिर मिलकर  शिव उपासना का तांत्रिक त्रिकोण बनाते हैं तथा सिद्धनाथ मंदिर रकाब गंज लखनऊ को इस त्रिकोण का केंद्र या नाभि माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि त्रिकोण के बीच के भूभाग मे बैठकर जो भी तांत्रिक साधना की जाती है, वह जल्दी ही सफल हो जाती है। भक्तो के बीच ऐसा जन विश्वाश है। अयोध्या के नागेश्वर नाथ मंदिर का शिवलिंग व प्रस्तर मूर्तियां मौर्य कालीन मानी जाती है। शेष मंदिरों की मूर्तियां रामायण कालीन है। सिद्धनाथ मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है।
    भगवान राम के अनुज से शेषावतार लक्ष्मण लखनऊ नगर के संस्थापक हैं। माता सीता को भगवान राम के आदेश से महर्षि वाल्मीकि के आश्रम बिठूर कानपुर जाते समय वह लखनऊ में कौण्डिय ऋषि के आश्रम में रुके थे। यह स्थान इस समय कुड़िया घाट या कौण्डिय घाट के नाम से जाना जाता है। बाद में भगवान राम ने लखनऊ का क्षेत्र लक्ष्मण जी को दे दिया था। तब लक्ष्मण जी ने लखनऊ नगर को विधिवत बसाया था तथा अपने लिए एक किला और महल बनवाया था। आजकल उसकी आरजी पर मेडिकल कॉलेज व टीले वाली मस्जिद बनी है उस स्थान को लक्ष्मण टीला कहा जाता है।
    लंका में राम रावण युद्ध के बाद जब रावण मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था तब भगवान राम ने अपने अनुज लक्ष्मण को रावण के पास यह कह कर भेजा था कि रावण महाज्ञानी हैं और महापंडित है वह मर रहा है अतः तुम उसके पास जाओ और ज्ञान प्राप्त करो। रावण ने लक्ष्मण को ज्ञान दान दिया था। जब लक्ष्मण अपने नगर लक्ष्मण पुरी के शासक हो गए तो उन्होंने वहां कोणेश्वर महादेव की शिव मंदिर और शिवलिंग की स्थापना कि। भगवान शिव लक्ष्मण के गुरु रावण के भी गुरु थे और उनके लिंग व मंदिर की स्थापना करके एक प्रकार से अपने गुरु को आदर प्रदान किया था। यह शिव त्रिकोण के तरीकोणेश्वर है जो अब कोणेश्वर कहे जाते हैं। यहां पर शिवलिंग मंदिर के कोने में स्थापित है। मंदिर का जीणोद्धार करते समय कई बार शिवलिंग को मंदिर के बीच में स्थापित करने का प्रयास किया गया लेकिन हर बार रात में शिवलिंग मंदिर के कोने में चला जाता था अतः थक हारकर लोगों ने शिवलिंग को कोने में ही स्थापित रहने दिया। अब मंदिर में बहुत से देवताओं के विग्रह स्थापित हैं और सावन के महीने और सावन के यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।

    मनकामेश्वर मंदिर डालीगंज लखनऊ

    प्रागैतिहासिक काल में लोग शिव पार्वती की उपासना प्रकृति के देवता के रूप में करते थे। शिव को पुरुष और देवी को प्रकृति के रूप में तब से अब तक माना जाता रहा है। सिंधु नदी घाटी की सभ्यता के अब तक प्राप्त अवशेषों में अरघे व शिवलिंग तथा नंदी बैल की प्रतिमा व मुद्रा अन्य बर्तनों आदि के साथ मिले हैं। बाद में किनके आधार पर विदेशी लेखकों ने शिवलिंग और अरघे को पुरुष का सीसन वह स्त्री की योनि के रूप में अरघे को मानकर यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि प्राचीन लोग शिशन पूजक थे और शिवलिंग की पूजा के स्वरुप को कुत्सित ठहराया है। किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं। संस्कृत भाषा में लिंग का मतलब प्रतीक या चिन्ह होता है। वहां पर लिंग का मतलब पुरुष का जननांग कदापि नहीं है। पुरुष के जननांग के लिए संस्कृत भाषा में शिशन शब्द का उपयोग होता है। शिवलिंग की आकृति अंडाकार है और विज्ञान भी कहता है कि हमारा ब्रम्हांड भी अंडाकार है अतः संपूर्ण संसार ही लिंग आकार है। जिसका सूक्ष्म स्वरुप शिवलिंग है। अतः विदेशी लेखकों के दुष्प्रचार से बचने की जरूरत है। भगवान एकलिंग की उपासना को समझने के लिए लोगों को शिव पुराण और लिंग पुराण का अध्ययन करना चाहिए।
    वैदिक काल में शिव के रूद्र रूप का वर्णन अधिक मिलता है। जहां पर वे मृत्यु और संहार के देवता हैं। अपने इस अघोर रूप में उनको श्मशान वासी माना जाता है और भूत-प्रेत, पिशाच आदि उनके साथी गण हैं। भांग-धतूरा आदि का सेवन उनको प्रिय है। वैदिक काल के मंत्रों में देवी देवताओं के स्वरूप का वर्णन मिलता है। उस समय यज्ञ करने का प्रचलन अधिक था। यज्ञ करते समय देवी देवताओं का आवाह्न किया जाता था तथा पूजन के उपरांत इनका विसर्जन कर दिया जाता था। वैदिक काल के बाद पुराण काल आया। एक अनुमान के अनुसार यह समय आज से लगभग दो हजार पांचसौ वर्ष पहले का माना जाता है। इस काल में यज्ञ करने की परंपरा तथा देवताओं का बार-,बार आवाह्न करने का चलन कम हो गया था। इसके स्थान पर अब मंदिरों का निर्माण होने लगा और उनमें देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित करके उनमे देवों की प्राण प्रतिष्ठा कर देने के बाद उनको सजीव मानकर उनकी पूजा करने का प्रचलन हो गया। अब देवों का बार-बार आवाह्न विसर्जन करने की आवश्यकता समाप्त हो गई। शिव जी के पार्वती जी से विवाह के बाद वैरागी शिव अब घर -गृहस्थी वाले शंकर जी हो गये, जो भक्तों के सभी कष्टों को हल कर उनकी सभी मनोकामना पूरी कर देते हैं।
    आदि गंगा मानी जाने वाली गोमती के किनारे भगवान शंकर के इसी स्वरूप रूपी शिवलिंग मनकामेश्वर मंदिर में विराजमान है। यहां भगवान भोलेनाथ आने वाले सभी भक्तों के कष्ट हर लेते हैं और उनकी सभी मनोकामनाओं को पूरा कर देते कर देते हैं। ऐसे भक्तों का विश्वास है और इसी कारण यहां शिवलिंग मनकामेश्वर कहलाता है। शिव भक्तों के बीच इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि दक्षिण भारत में मदुरई स्थित मंदिर में भगवती मीनाक्षी के साथ-साथ सुंदरेश्वर कामेश्वर के रूप में भगवान शंकर भी विराजमान है। साथ में लखनऊ के डालीगंज मोहल्ले में भी मनकामेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित है।

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