राहुल कुमार गुप्ता
समता और इंसानियत के सच्चे पथप्रदर्शक योगीराज सदगुरु सच्चिदानंद श्री शिरडी साईं बाबा जिन्होंने इंसानों को आपस में प्रेम से रहना सिखाया और अपने शिष्यों के दुख दर्द दूर करने में सदा तत्पर रहे और समाधिस्थ होने के बाद भी सदैव तत्पर हैं। वो बिल्कुल गुरु ग्रह की तरह ही गुरु का पद सुशोभित करते हैं। जिस प्रकार गुरु ग्रह क्षुद्र ग्रहों से पृथ्वी की निरंतर रक्षा करते हैं उसी प्रकार से सदगुरु श्री शिरडी साईं बाबा भी अपने चाहनेवालों की समस्याओं को खींचकर उनकी रक्षा करते हैं।
गुरु पद इसलिए भी महान है कि सच्चा गुरु अपने शिष्यों की समस्याओं को खुद झेलता है। इन समस्याओं को सहने की ताकत उन्हें उनकी तपस्या और योग से मिलती है, जिससे स्वतः उनमें गुरुत्वाकर्षण बल तैयार हो जाता है। यह बल एक उचित परास में भी कार्य करता है। उस परास (रेंज) को बनाए रखने का कार्य चाहने वालों/ शिष्यों को ही करना होता है। ऐसी परास तैयार होती है, मन में उत्पन्न सच्चे भाव से और गुरु की शिक्षाओं पे अमल करने से। हां! ये भी जरूरी है कि गुरु में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति हो। यानी कि वो सच्चा तपस्वी, ज्ञानी, योगी और दयालु हो तभी गुरु की महिमा भी चरितार्थ होती है।
श्री शिरडी साईं बाबा ने कभी खुद को ईश्वर नहीं कहा, उन्होंने गुरु पद ही स्वीकार किया ताकि वो अपने शिष्यों के संकटों को खींच सकें। कई लोगों ने अति प्रेम के चलते उन्हें भगवान का दर्जा दिया, जबकि श्री शिरडी साईं बाबा खुद गुरु पद से ही सुशोभित होने को कह कर समाधिस्थ हुए थे।







