10 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के लापता होने के बढ़ते मामलों पर एक महत्वपूर्ण सुनवाई की। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने केंद्र सरकार से गंभीर सवाल उठाए और स्पष्ट निर्देश दिए। अदालत ने केंद्र को यह जांचने का आदेश दिया कि क्या देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के गायब होने के पीछे कोई संगठित राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क काम कर रहा है, या ये ज्यादातर अलग-अलग राज्यों में होने वाली स्वतंत्र घटनाएं हैं।
पीठ ने कहा, “हमें यह जानना जरूरी है कि क्या इन घटनाओं में कोई पैटर्न है या ये पूरी तरह से यादृच्छिक (रैंडम) हैं। क्या कोई राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क या राज्य-विशेष समूह इसके पीछे है?” यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर कोई संगठित व्यवस्था मौजूद है, तो समस्या की गहराई बहुत अधिक है और इसे रोकने के लिए समन्वित राष्ट्रीय स्तर की रणनीति की जरूरत होगी।
यह सुनवाई एक जनहित याचिका (PIL) पर हो रही थी, जिसे एनजीओ ‘गुरिया स्वयं सेवी संस्थान’ ने दाखिल किया था। याचिका में देशभर में लापता बच्चों की संख्या में वृद्धि और कई बच्चों के अब तक न मिलने की बात उठाई गई थी। अदालत ने पहले भी केंद्र को निर्देश दिया था कि वह पिछले छह वर्षों का राष्ट्रीय स्तर पर लापता बच्चों का डेटा उपलब्ध कराए और गृह मंत्रालय में एक समर्पित अधिकारी नियुक्त करे, जो राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ समन्वय बनाए रखे।
अदालत ने अब केंद्र को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से विस्तृत आंकड़े एकत्र करने और उनका गहन विश्लेषण करने का आदेश दिया है। पीठ ने कहा कि डेटा के बिना पैटर्न का पता लगाना मुश्किल है। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि जिन बच्चों को बचाया गया है, उनसे बातचीत की जाए ताकि यह समझा जा सके कि अपराध कैसे होते हैं और जिम्मेदार कौन हैं।

लापता बच्चों की समस्या की गहराई
भारत में बच्चों के लापता होने का मुद्दा वर्षों से चिंता का विषय रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लाखों बच्चे लापता होने की रिपोर्ट दर्ज होती है। हाल के वर्षों में रिपोर्टिंग सिस्टम में सुधार के कारण मामलों की संख्या में थोड़ी वृद्धि दिखाई दी है, लेकिन समस्या अभी भी गंभीर है।
कई मामलों में बच्चे परिवार से भाग जाते हैं, कुछ स्कूल या काम की तलाश में निकल पड़ते हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा मानव तस्करी, बाल श्रम, यौन शोषण या अन्य अपराधों का शिकार होता है। शहरों में सड़कों पर काम करने वाले बच्चे, गरीब परिवारों के बच्चे और प्रवासी मजदूरों के बच्चे सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई में यह बात सामने आई कि कई राज्यों ने अभी तक पूरा डेटा नहीं साझा किया है, जिससे विश्लेषण में देरी हो रही है। अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह डेटा संग्रह को तेज करे और जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करे।
बच्चों की सुरक्षा के लिए मौजूदा प्रयास और चुनौतियांदेश में बच्चों की सुरक्षा के लिए कई योजनाएं और तंत्र मौजूद हैं, जैसे:ट्रैक द चाइल्ड पोर्टल (राष्ट्रीय आयोग फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स द्वारा संचालित)
खोजी और खोया-पाया जैसे ऐप्स, जो लापता बच्चों की रिपोर्टिंग और ट्रैकिंग में मदद करते हैं।
पुलिस और चाइल्डलाइन जैसी हेल्पलाइनें।
अंतर-राज्य समन्वय के लिए गृह मंत्रालय की भूमिका।
फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं:
- रिपोर्टिंग में देरी या अधूरी जानकारी।
- पुलिस और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी।
- ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में जागरूकता की कमी।
- डिजिटल ट्रैकिंग और AI-आधारित सिस्टम का सीमित उपयोग।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इन चुनौतियों को दूर करने की दिशा में एक मजबूत कदम है। अगर डेटा विश्लेषण से कोई पैटर्न सामने आता है, तो नीति-निर्माताओं को लक्षित अभियान चलाने में आसानी होगी—जैसे विशेष क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना, तस्करी गिरोहों पर कार्रवाई या जागरूकता कार्यक्रम।
बच्चों की सुरक्षा: राष्ट्रीय प्राथमिकता
बच्चे देश का भविष्य हैं। उनका लापता होना न केवल परिवारों के लिए दर्दनाक है, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल याद दिलाती है कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय और राष्ट्रीय दायित्व है।
अदालत ने केंद्र को स्पष्ट संदेश दिया है कि डेटा संग्रह और विश्लेषण को प्राथमिकता दें। उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस निर्देश का पूरी गंभीरता से पालन करेंगी। इससे न केवल लापता बच्चों की संख्या कम हो सकती है, बल्कि अपराधियों पर भी सख्ती से नकेल कसी जा सकती है।
अंत में, यह सुनवाई हमें याद दिलाती है कि समाज का हर सदस्य परिवार, स्कूल, पुलिस, एनजीओ और सरकार बच्चों की सुरक्षा में अपनी भूमिका निभाए। क्योंकि एक भी बच्चा लापता होना बहुत अधिक है।







