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    Home»ब्लॉग

    रूतबा दिखाना आदत होती है अफसरों की

    ShagunBy ShagunApril 21, 2025Updated:April 24, 2025 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    आरएएस अधिकारी मुक्ता राव पर आरोप लगाकर सुसाइड करने वाले भारत सैनी के मामले की जांच सरकार को अपने स्तर पर भी करानी चाहिए

    ओम माथुर

    क्या कोई व्यक्ति किसी को बदनाम करने के लिए खुद आत्महत्या कर सकता है? क्या कोई व्यक्ति अपने बूढ़े मां-बाप, पत्नी व बच्चों को बेहाल छोड़कर किसी को ब्लैकमेल करने के लिए आत्महत्या कर सकता है? आपका जवाब निश्चित रूप से नहीं होगा। लेकिन ये सवाल इसलिए कि कल जयपुर में एक महिला आरएएस अधिकारी मुक्ता राव द्वारा उनके मकान की इंटीरियर करने वाले आर्किटेक्ट भारत सैनी को पूरा भुगतान नहीं करने के कारण भारत ने आत्महत्या कर ली। उसके द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट के जवाब में मुक्ता राव ने ये कहा है कि यह उन्हें बदनाम और ब्लैकमेल करने के लिए किया गया पूर्व नियोजित आपराधिक षड्यंत्र है। पैसे भारत सैनी नहीं,चार लाख रुपए हम उनसे मांगते थे। जो उन्होंने उधार लिए थे।

    खबर तो आपने अखबारों में पढ़ ही ली होगी। संक्षेप में,आर्किटेक्ट सैनी ने सिरसी रोड पर स्थित रॉयल ग्रीन सोसाइटी अपार्टमेंट की 14वीं मंजिल से छलांग लगाकर सुसाइड कर लिया। यहां उन मुक्ता राव का फ्लैट है, जिसकी इंटीरियर सैनी ने की थी। मरने से पहले सैनी ने सुसाइड नोट लिखा था। उसका सार ये है कि राव काम के बकाया पैसे का भुगतान नहीं कर रही थी और बाजार में दुकानदार उन्हें रोज परेशान कर रहे थे। उन्होंने लिखा कि मैंने निवेदन किया कि मेरा हिसाब कर दो। मेरे पास जहर खाने को भी पैसे नहीं है। मृतक के पिता का आरोप है कि भारत ने सुसाइड नोट दिखाते हुए आरएसएस अधिकारी को शिकायत की कि मेरी हालत मरने जैसी हो गई है। तो उन्होंने कहा कि मेरी तरफ से आज क्या, अभी मर जा और इसके बाद भारत ने छलांग लगा दी। हालांकि मुक्ता राव और सैनी के बीच क्या बातचीत हुई,इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन सैनी का सुसाइड नोट बता रहा है कि उनकी आत्महत्या का कारण अटके हुए पैसे ही थे। सच्चाई क्या है अगर पुलिस निष्पक्षता से जांच करेगी तो सामने आ सकती है

    आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारियों की छवि अपने पद का रूतबा दिखाकर कम कीमत या मुफ्त में विभिन्न सेवाएं और सुविधाएं प्राप्त करना होता है। ऐसे कई अधिकारी हैं,जिनके घरों में सब्जियां,परचूनी का सामान,बाकी जरूरत की चीजें और आधुनिक सुख-सुविधाओं का भुगतान उनकी जेब से नहीं बलि्क उनके द्वारा उपकृत किए गए लोगों या फिर अधीनस्थों द्वारा किया जाता है। जाहिर है जब कोई अपनी जेब से कोई पैसा खर्च नहीं करता और जो इसका भुगतान करता है,वह इन अधिकारियों की कृपा से या तो घोटाला-रिश्वतखोरी करता है या फिर उनसे नियमविरुद्ध काम करा लेते है। अधिकांश अधिकारी अपने रुतबे का या तो सीधा इस्तेमाल करते हैं या अपने अधीनस्थों के जरिए संबंधित व्यक्ति ( जिससे कुछ लेना या काम कराना है) को अपनी हैसियत बतला देते हैं।

    ऐसा नहीं है कि सभी अधिकारी भ्रष्ट,बेईमानऔर लालची है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की जो छवि आम जनता के बीच है,दुर्भाग्य से वो यही है। लोगों को यही लगता है अफसरों को लूटखसोट की आदत होती है। चाहे वह सरकारी योजनाओं में से माल समेटना हो या अपनी घरेलू जरूरतों-सुविधाओं को पूरा करने के लिए बाजार से कुछ लेना हो। इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा की कोई भी सेवा देने या काम करने वाला व्यक्ति जब किसी आईएएस, आईपीएस, आरएएस या आरपीएस या अन्य किसी श्रेणी के अफसर के यहां काम करता है, तो वह पहले ही दबाव में होता है। उसे वहां से कुछ कमाने से ज्यादा चिंता इस बात की होती है कि जितना पैसा उसका लगेगा, उतना भी वापस मिलेगा या नहीं। कुछ अधिकारियों से ( पुलिस महकमे वाले ज्यादा) तो ये डर ज्यादा ही रहता है। सैनी ने भी अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि मैंने मुक्ता राव की आवाज और विश्वास पर ₹1200 स्क्वायर फीट की दर पर दो हजार -बाइस सौ रुपए वाला काम करके दिया है। जो काम मैंनै 39 लाख 60 हजार में करके दिया।इसमें से मुझे 21 लाख रुपए ही मिले। अब मेरी सारी उम्मीदें टूट गई है। मुझे यह भी पता है कि मेरे मरने के बाद भी मुझे पैसा नहीं मिलेगा और ना कोई हर्जाना।

    मुक्ता राव के पति ने मुझे ये कहकर रवाना कर दिया था कि 50 हजार या एक लाख ज्यादा से ज्यादा निकलेगा। अब मेरे पास सुसाइड के अलावा कोई रास्ता नहीं है

    शुक्रवार को अपने बेटे की आत्महत्या के बाद पिता भानु प्रताप ने सुसाइड नोट के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कराया था। लेकिन आज उन्होंने मीडिया से कहा कि वह कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं,क्योंकि उन्हें उनके बकाया पैसे मिल गए हैं। अगर यह बात सच है, तो इसका मतलब ये हुआ कि वाकई भारत सैनी,मुक्ति राव से पैसे मांगते थे। और अगर नहीं मांगते थे, तो फिर मुक्ता राव ने उनके पिता को पैसे किस बात के लिए दिए। क्या मामले को दबाने के लिए? राज्य सरकार को इस मामले में अपनी ओर से भी जांच करानी चाहिए की क्या वाकई भारत सैनी की आत्महत्या की जिम्मेदार आरएएस अधिकारी है या फिर मामले को दबाने के लिए मृतक के परिवार को पैसे देकर उनका मुंह बंद करा दिया गया है,ताकि सच्चाई सामने ही ना सके। किसी भी प्रशासनिक अफसर को इस बात की छूट नहीं दी जा सकती कि वह जनता के सेवक बनने की बजाय शासक बनकर उन पर राज करने की मंशा से काम करें। आपकी जानकारी के लिए मुक्ता राव 2018 बैच की टॉपर हैं।

    अब दो सच्चे किस्से इन अधिकारियों की नीयत से जुड़े हुए

    1. पहला- 15 साल पुरानी बात है। अजमेर के सर्किट हाउस में सुबह एक सीनियर आईएएस अफसर की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। मुझ सहित बाकी अखबार वाले हाल में उनके आने का इंतजार कर रहे थे। तभी आईएएस के साथ आए उनके पीए ने वहां खडे़ विभाग के स्थानीय अधिकारी से कहा,साहब अजमेर की प्रसिद्ध कढी-कचोरी लेकर जाएंगे। बीस-पच्चीस पीस मंगवा कर गाड़ी म़े रखवा देना।
    2. -दूसरा- एक वरिष्ठ आरएएस अधिकारी के पीए ने फल- सब्जी मंडी के एक अधिकारी को फोन किया कि साहब के घर नींबू भिजवा देना। उस वक्त नींबू करीब तीन सौ रुपए किलो होंगे। अधिकारी ने पूछा कितने भेजू़ं। तो पीए ने जवाब दिया, 20-30 किलो भिजवा देना। मेमसाहब को अचार डालना है। मजबूर अधिकारी ने भिजवा दिए। लेकिन दूसरे दिन उसके पास पीए का फोन आया कि नींबू छोटे थे,अचार वाले नहीं. साहब बहुत नाराज हो रहे थे।

    इन किस्सों को लिखने का आशय यही है कि जो अधिकारी छोटी-छोटी चीजों के लिए जेब से पैसे खर्च नहीं करते हैं। सोचिए,वह बड़ा सामान खरीदने या बड़ा काम कराने में पैसों की चपत किस-किस को लगाते होंगे।

    Shagun

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