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    Home»धर्म

    वर्तमान परिदृश्य में हनुमान जी और उनके चरित की प्रासंगिकता

    ShagunBy ShagunApril 2, 2026Updated:April 2, 2026 धर्म No Comments7 Mins Read
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    The Relevance of Lord Hanuman and His Character in the Contemporary Scenario
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    कुछ नई जानकारियों के साथ हनुमान जयंती पर विशेष आलेख

    राहुल कुमार गुप्ता

    श्री रामदूत हनुमान केवल एक पौराणिक चरित्र नहीं हैं, बल्कि वे अनंत ऊर्जा, अदम्य इच्छाशक्ति और पूर्ण समर्पण के वैश्विक प्रतीक हैं। वे असंभव शब्द को चुनौती देने वाले उस सामर्थ्य का नाम है, जिन्होंने भक्ति को शक्ति और सेवा को साम्राज्य से ऊपर रखा।
    हनुमान जी के बारे में बहुत सी जानकारियां सामान्यतः सभी को ज्ञात हैं। हम उनके व्यक्तित्व से संबंधी कुछ जानकारियों को आज के परिदृश्य से देखने का एक प्रयास कर रहे हैं। तो आज देखते हैं आज के परिदृश्य से अंजनिपुत्र वीर हनुमान जी के जीवन को, और देखते हैं हमें उनके जीवन दर्शन से क्या सीख मिलती है?

    हनुमान जी का जन्म अंजनीपुत्र और केसरीनंदन के रूप में हुआ। वायु पुत्र के रूप में भी हनुमान जी पूजे जाते हैं। यहां बहुत से कम जानने वाले लोग और नास्तिक लोग आकर ठिठक जाते हैं। क्योंकि वो अपने सीमित ज्ञान के नजरिए और संकीर्ण विचारधारा के बहाव में इस विषय को देखते हैं। जबकि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था आज से काफी भिन्न थी। उस समय के अनुसार हम आज के दौर पे कुछ लोगों के बीच विवादित विषय को इस प्रकार से देखते हैं। जिस प्रकार एक बीज (केसरी-अंजना का तप) को फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण और शक्ति (वायु देव का प्रवाह) चाहिए होती है, वैसे ही हनुमान जी का प्राकट्य एक ईश्वरीय कोलेब्रेशन है। वे केसरी-नंदन (कुल के गौरव) भी हैं और मारुति-नंदन (ब्रह्मांडीय शक्ति के अंश) भी। हनुमान जी का जन्म काम-वासना का परिणाम नहीं, बल्कि तप (केसरी-अंजना) और तत्व (वायु-शिव) का मिलन है। वे जैविक रूप से केसरी के वंशज हैं और तत्व रूप से वायु के पुत्र हैं।

    हनुमान जी आध्यात्मिक दृष्टि से वे भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार हैं और वायुपुत्र होना इस बात का संकेत है कि हनुमान जी का संबंध प्राण वायु से है। जैसे वायु के बिना जीवन संभव नहीं, वैसे ही हनुमान जी उस गतिशील ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ब्रह्मांड के कण-कण में व्याप्त है। उनका केसरी नंदन होना पृथ्वी तत्व और वायुपुत्र होना आकाश तत्व के मिलन को दर्शाता है।
    हनुमान जी की भक्ति, दास भाव की पराकाष्ठा है। जब उनसे पूछा गया कि वे कौन हैं, तो उन्होंने कहा:

    “देहबुद्ध्या तु दासोऽहं जीवबुद्ध्या त्वदंशकः। आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहम्…”
    (शरीर के भाव से मैं आपका दास हूँ, जीव भाव से आपका अंश और आत्म भाव से मैं साक्षात आप ही हूँ।)

    मनोविज्ञान की भाषा में इसे फ्लो स्टेट कहा जाता है, जहाँ कर्ता और कर्म के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। हनुमान जी की भक्ति में अहं शून्य है। जब अहंकार शून्य होता है, तब व्यक्ति की क्षमताएं असीमित हो जाती हैं। यही कारण है कि वे विशाल समुद्र लांघ सके, क्योंकि उन्हें खुद से ज्यादा अपने आराध्य पर विश्वास था। आराध्य भी ऐसे कि जो ब्रह्माण्ड की मर्यादाएं बनाए रखते हैं, जो कहते हैं, “निर्मल मन जो सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।” इतने सरल और सहज जब विश्व के नायक आराध्य हों तो समझिए शक्ति, सरलता, सहजता, और विनम्रता के ये सारे गुण आत्मसात करना अपने ऊपर उपकार करने जैसा है।

    हमारे बजरंगबली अखंड ब्रह्मचारी हैं। यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि ऊर्जा का संचय है।
    आयुर्वेद और योग विज्ञान के अनुसार, वीर्य को ओज में बदलना ही ब्रह्मचर्य है। हनुमान जी ने अपनी जननेंद्रिय ऊर्जा को मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा में रूपांतरित किया। इसे आधुनिक न्यूरोसाइंस की भाषा में ब्रेन प्लास्टिसिटी और न्यूरल एनर्जी का उच्चतम स्तर कह सकते हैं, जिससे उनकी स्मरण शक्ति और बुद्धि ”बुद्धिमतां वरिष्ठम्” (बुद्धिमानों में श्रेष्ठ) के स्तर तक पहुँची तथा वीरता विनम्रता की ढाल से संयुक्त हो गई।

    उनकी वीरता का प्रमाण लंका दहन से लेकर द्रोणागिरि पर्वत उठाने तक मिलता है। उनकी वीरता आक्रामक नहीं, बल्कि रक्षात्मक और उद्देश्यपूर्ण है।
    मारुति नंदन द्वारा सूर्य के निगलने की जो कथा आती है तो वह एक प्रतीक है कि एक उच्च स्तर की ऊर्जा ने भौतिक ऊर्जा को नियंत्रित कर लिया।
    जो यह दर्शाता है कि चेतना पदार्थ से कहीं अधिक शक्तिशाली है।

    हनुमान जी को समस्त वेदों और विधाओं का ज्ञान भी सूर्य से ही प्राप्त हुआ। यहां सूर्य को निगलने का प्रयास वास्तव में ‘पूर्ण ज्ञान को आत्मसात’ करने की एक रूपक (मेटाफोरिकल) क्रिया भी हो सकती है।

    पवनसुत का सुरसा के मुख में प्रवेश करना और सूक्ष्म रूप धरकर बाहर आना, यह युद्ध कौशल में एडेप्टेबिलिटी (अनुकूलनशीलता) को दर्शाता है। वीरता केवल बल में नहीं, बल्कि सही समय पर सही आकार और विचार चुनने में है। हनुमान जी सिखाते हैं कि समस्या अगर पहाड़ जैसी बड़ी है, तो समाधान उसे उखाड़ फेंकने के साहस में है।

    हनुमान जी के पास अष्ट सिद्धि और नवनिधि है, फिर भी वे स्वयं को राम दूत ही कहते हैं। रावण के दरबार में भी वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय शांति का प्रस्ताव लेकर जाते हैं।
    इसे हम्बल लीडरशिप (विनम्र नेतृत्व) कहा जाता है। महानता वह नहीं जो डराए, महानता वह है जो सेवा करे। विभीषण को शरण दिलाना और सुग्रीव का राज्य वापस दिलाना उनकी इसी उदारता का परिचायक है। वे शक्ति का उपयोग दमन के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए करते हैं।

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    हनुमान जी का ध्यान निरंतर राम नाम में रहता है। चित्रपटों में उन्हें अक्सर हृदय चीरकर राम-सीता को दिखाते हुए दर्शाया गया है।
    निरंतर नाम जप (मंत्र ध्यान) मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को सक्रिय करता है, जिससे एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। हनुमान जी का ध्यान उन्हें विचलित होने से बचाता है। लंका जैसी विलासी नगरी में भी उनका मन स्थिर रहा, जो उनकी ध्यान की शक्ति को दर्शाता है। श्री रामदूत भी अमरत्व को प्राप्त है। सप्त चिरंजीवियों में हनुमान जी एक हैं। “अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण:…”
    ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार, ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। हनुमान जी वह चेतना हैं जो हर युग में जाग्रत है। जब तक पृथ्वी पर राम कथा (सत्य और धर्म की चर्चा) रहेगी, हनुमान जी का अस्तित्व वाइब्रेशन के रूप में मौजूद रहेगा। वे मृत्यु पर विजय पाने वाले उस संकल्प का नाम हैं जो समय की सीमाओं को लांघ चुके हैं।

    हनुमान जी को वाक्पटु कहा गया है। जब वे पहली बार श्रीराम से मिले, तो उनके शब्दों के चयन से राम अत्यंत प्रभावित हुए। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान और व्याकरण के ज्ञाता हैं। सफल संचार वह है जो सामने वाले का हृदय जीत ले।

    संजीवनी बूटी की पहचान करना और उसे समय पर लाना उनके औषधीय ज्ञान और लॉजिस्टिक्स प्रबंधन को दिखाता है। आज के दृश्य में हनुमान जी को एक बेहतरीन क्राइसिस मैनेजर के रूप में भी देखा जा सकता हैं। समुद्र पार करने की योजना, लंका में सूचना तंत्र विकसित करना और युद्ध के दौरान विभीषण जैसे रणनीतिकार को साथ लाना उनकी प्रबंधन क्षमता का अद्भुत उदाहरण है।

    हनुमान जी के जीवन दर्शन से आज के दौर में भी हम जीवन से संबंधित बहुत सी महत्वपूर्ण बातें सीखते हैं। जैसा कि शक्ति तब तक

    व्यर्थ है जब तक वह चरित्र के अधीन न हो।
    बुद्धि तब तक बोझ है जब तक वह विनम्रता से न जुड़ी हो।
    भक्ति ही वह माध्यम है जिससे साधारण वानर, महावीर बन सकता है।
    वे केवल रुद्रावतार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन दर्शन हैं।

    उनके जीवन दर्शन के कुछ-कुछ अंश ही आत्मसात कर लें तो जीवन जीने का लक्ष्य ही पूर्ण हो जाए। चरित्र में संयम, बुद्धि में विवेक और हृदय में पूर्ण समर्पण हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। ये शक्ति और शील के उस शाश्वत सेतु के समान हैं, जिस पर चलकर मनुष्य अपनी लौकिक सीमाओं को त्यागकर अपनी आंतरिक दिव्यता और अमरत्व का साक्षात्कार कर सकता है।

    जय श्री राम! जय हनुमान!

    Shagun

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