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    मीडिया के सरलीकरण ने छीन लिया पावन शब्द प्रेम की महानता

    ShagunBy ShagunApril 2, 2026Updated:April 2, 2026 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    The simplification by the media has stripped the sacred word 'love' of its greatness.
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    आसक्ति के एक संकुचित रूप को प्रेम शब्द से संबोधित कर हम प्रतिदिन करते हैं पावन शब्द प्रेम का अपमान

    राहुल कुमार गुप्ता

    जरूर! यह बात जल्द किसी को पसंद नहीं आने वाली। क्योंकि इस आलेख में प्रेम के वास्तविक आशय को दर्शाया गया है और मीडिया द्वारा फैलाए गए छद्म प्रेम के बारे में भी बताया जा रहा है। कैसे एक पावन शब्द की महिमा को आज के दौर में एक बहुत ही गलत रूप दिया जा चुका है। हम वर्तमान समय के उस कड़वे सच की ओर इशारा करते हैं, जहाँ हमने शब्दों के अर्थों को अपनी सुविधा और विकृतियों के अनुसार ढाल लिया है। यह एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है कि समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार शब्दों की गहराई बदलती रहती है, लेकिन प्रेम जैसे शाश्वत शब्द के साथ जो खिलवाड़ आधुनिक युग में हुआ है, वह वास्तव में इसकी गरिमा पर एक प्रहार है। जिसे आज हम ‘प्रेम’ कहकर पुकारते हैं, वह अधिकांशतः आसक्ति का एक संकुचित रूप है।

    मीडिया और सिनेमा ने जिस तरह के शीर्षकों से प्रेम को परिभाषित करना शुरू किया है; जहाँ हिंसा, प्रतिशोध और वासना का बोलबाला है। वहाँ प्रेम शब्द अपनी पवित्रता खो देता है। जब हम पढ़ते हैं कि “प्रेमी ने प्रेमिका की हत्या की,” तो वहाँ प्रेम का अस्तित्व उसी क्षण समाप्त हो जाता है। प्रेम में तो ‘स्व’ का विसर्जन होता है, वहाँ दूसरे को क्षति पहुँचाने का विचार भी असंभव है। इसलिए, ऐसे कृत्यों के लिए ‘आसक्त’ शब्द का प्रयोग करना ही न्यायसंगत होगा, क्योंकि आसक्ति अधिकार चाहती है, जबकि प्रेम केवल अर्पण करना जानता है।

    प्रेम के वास्तविक और विराट स्वरूप को समझने के लिए हमें कबीर, तुलसी, मीरा और सूफी संतों के उस आध्यात्मिक धरातल पर उतरना होगा, जहाँ प्रेम ढाई अक्षरों में सिमटा होने के बावजूद संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए है। कबीर दास जी ने जब कहा, “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय,” तो उनका आशय किसी देह-केंद्रित आकर्षण से नहीं था। उनके लिए प्रेम वह कीमिया थी जो मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष खड़ा कर देती है। कबीर का प्रेम एक अग्नि परीक्षा है, जहाँ “सीस उतारे भुईं धरे, तब पैठे घर माहि” की शर्त लागू होती है। यानी जो अपने अहंकार और अपने अस्तित्व के मोह को त्याग सके, वही प्रेम की देहरी पर कदम रख सकता है। आज के युग में जिसे हम प्रेम समझ रहे हैं, वह स्वार्थ की पूर्ति का साधन मात्र है, जबकि कबीर का प्रेम ‘स्व’ को मिटाकर ‘सर्व’ हो जाने की प्रक्रिया है।

    ठीक इसी भाव को मीराबाई के जीवन में देखा जा सकता है। मीरा का प्रेम कोई सामाजिक अनुबंध नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी विद्रोही चेतना थी जिसने राजसी वैभव को विष के प्याले के सामने तुच्छ सिद्ध कर दिया। मीरा के लिए प्रेम आसक्ति नहीं, बल्कि प्रेम का चरमोत्कर्ष था। जब वे गाती हैं, “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई,” तो वे उस अनन्य प्रेम की घोषणा करती हैं जहाँ संसार की तमाम वस्तुएं और संबंध फीके पड़ जाते हैं। यहाँ प्रेम और इबादत (तपस्या) के बीच की रेखा समाप्त हो जाती है। प्रेम और इबादत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मीरा के लिए कृष्ण कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि उनके अंतर्मन की वह चेतना थे जिससे जुड़कर वे स्वयं अमर हो गईं। उनका प्रेम संकुचित नहीं, बल्कि इतना विशाल था कि उसमें पूरा संसार समा सकता था, फिर भी वे केवल एक की होकर रहीं।

    गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से प्रेम के जिस मर्यादित और व्यापक स्वरूप को प्रस्तुत किया, वह आज के समाज के लिए एक दर्पण है। तुलसी का प्रेम स्वार्थ पर नहीं कर्तव्य और समर्पण पर टिका है। राम और सीता का प्रेम केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है, बल्कि वह मर्यादा और धर्म का संगम है। तुलसीदास जी के अनुसार, “रामहि केवल प्रेमु पिआरा, जानि लेउ जो जाननिहारा।” अर्थात ईश्वर को केवल प्रेम ही प्रिय है। यहाँ प्रेम का अर्थ है, जड़ और चेतन! सबमें उस परम तत्व को देखना। जब मनुष्य की दृष्टि इतनी व्यापक हो जाती है कि उसे हर कण में अपने प्रिय का वास दिखने लगे, तब वह किसी को चोट नहीं पहुँचा सकता। आसक्ति यहाँ पूरी तरह विलुप्त हो जाती है, क्योंकि आसक्ति व्यक्ति को बांधती है, जबकि तुलसी का प्रेम उसे समस्त मानवता से जोड़कर मुक्त कर देता है।

    प्रेम की इस पावन धारा में सूफी संतों का योगदान भी अत्यंत संवेदनशील और गहरा है। सूफी मत में इश्क-ए-मिजाजी (सांसारिक प्रेम) को इश्क-ए-हकीकी (ईश्वरीय प्रेम) तक पहुँचने की पहली सीढ़ी माना गया है। रूमी, हाफिज और बुल्ले शाह जैसे सूफियों के लिए प्रेम वह रूहानी संगीत है जो आत्मा को परमात्मा से मिलाता है। बुल्ले शाह जब कहते हैं, “रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई,” तो वे प्रेम की उस पराकाष्ठा की बात कर रहे होते हैं जहाँ प्रेमी और प्रियतम के बीच का भेद मिट जाता है। यह वही अद्वैत अवस्था है जहां प्रेम, सृष्टि के रचयिता और ब्रह्मांड की विशालता को अपने में समेट लेता है। सूफियों के यहाँ प्रेम कोई भावना नहीं, बल्कि एक हाल (अवस्था) है। इस अवस्था में पहुँचा हुआ व्यक्ति नफरत कर ही नहीं सकता। यदि आज के समाज में प्रेम के नाम पर हिंसा हो रही है, तो इसका सीधा अर्थ है कि हम सूफियों के उस रूहानी प्रेम से कोसों दूर केवल दैहिक आकर्षण के मरुस्थल में भटक रहे हैं।

    भगवान श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम तो इस धरा पर प्रेम की सबसे ऊँची परिभाषा है। राधा-कृष्ण का प्रेम सामाजिक बंधनों, विवाह की औपचारिकताओं और दैहिक सीमाओं से परे है। वह एक ऐसी ऊर्जा है जो संसार को सृजन की प्रेरणा देती है। यदि हम इसे आज के आसक्त नजरिए से देखेंगे, तो हम कभी उस विरह और मिलन के आनंद को नहीं समझ पाएंगे जो शून्य में भी पूर्णता तलाश लेता है। प्रेम की महानता इसमें है कि वह सामने वाले को स्वतंत्रता देता है। जबकि आसक्ति में पकड़ होती है और प्रेम में मुक्ति। जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो हम उसके विकास की कामना करते हैं, न कि उसे अपनी इच्छाओं की बेड़ियों में जकड़ने की। आज के दौर की क्राइम स्टोरीज में जिसे प्रेम कहा जा रहा है, वह वास्तव में ईर्ष्या, असुरक्षा और अहंकार का मिला-जुला रूप है, जिसे प्रेम का चोला पहनाकर इस पवित्र शब्द का अपमान किया जा रहा है।

    प्रेम वास्तव में ईश्वर का सबसे प्रिय गुण है क्योंकि ईश्वर स्वयं प्रेम है। ब्रह्मांड की हर गति, नक्षत्रों का घूमना, ऋतुओं का परिवर्तन और जीवन का प्रवाह सब प्रेम के एक सूक्ष्म सूत्र से बंधे हैं। यदि इस सृष्टि के केंद्र में प्रेम न होता, तो यह कब की बिखर चुकी होती।

    हम अपनी शब्दावली और अपनी संवेदनाओं को पुनः परिष्कृत करें। हमें यह समझना होगा कि आसक्ति और प्रेम के बीच एक बहुत महीन लेकिन गहरी रेखा है। आसक्ति अंधेरा है जो मनुष्य को विवेकहीन बनाता है, जबकि प्रेम वह प्रकाश है जो मनुष्य को पंडित यानी ज्ञानी बनाता है। कबीर की वह ढाई अक्षर वाली परिभाषा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी। प्रेम को केवल देह और फिल्मों के संकुचित दायरे से बाहर निकालकर जब हम इसे ब्रह्मांडीय चेतना के रूप में देखेंगे, तभी हम इसकी पावनता को सुरक्षित रख पाएंगे। प्रेम कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जाए, प्रेम एक साधना है जिसमें स्वयं को खोकर ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। प्रेम के साथ न्याय तभी होगा जब हम आसक्त को ‘आसक्त’ और प्रेमी को ‘प्रेमी’ कहने का साहस जुटा पाएंगे, ताकि प्रेम की वह गरिमा जो कबीर, मीरा और राधा-कृष्ण के युग में थी, पुनः स्थापित हो सके। यह लेख केवल शब्द मात्र नहीं है! और न ही समाज को आइना दिखाने के लिए! बल्कि ये प्रेम के वास्तविक स्वरूप की पुनर्व्याख्या करने की एक गंभीर और संवेदनशील पुकार है।

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