सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों-कर्मचारियों एक सीट पर वर्षों तक जमे रहना अब आम बात है। इसके लिए वे कई तरह के हथकंडे भी अपनाते हैं। इस बारे में एक संसदीय समिति ने असली नब्ज पर हाथ रखते हुए कहा है कि इन लोगों के लंबे समय तक एक ही जगह पर पदस्थ रहने से भ्रष्टाचार बढ़ता है। इसलिए यह सुनिश्चित होना चाहिए कि वे किसी भी मंत्रालय में निर्धारित समय-सीमा से अधिक न बने रहें।
समिति का यह भी कहना है कि सभी अधिकारियों के लिए ‘बारी-बारी से स्थानांतरण नीति रही है लेकिन उसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा है। उसका यह भी मत है कि ऐसे उदाहरण आए हैं जहां अधिकारियों ने अपनी तैनाती में ऐसी चतुराई दिखाई है कि उनका पूरा कार्यकाल एक ही मंत्रालय में रहा है और इसीलिए ऐसी खामियों को बिना किसी देरी के दूर किया जाना चाहिए।’
समिति के अनुसार ऐसे भी अधिकारी हैं जो संभावित रूप से अनुकूल मंत्रालयों या स्थानों पर आठ या नौ वर्षों से अधिक समय से तैनात हैं विशेष रूप से आर्थिक एवं संवेदनशील मंत्रालयों में, जबकि संगठन प्रमुखों को चार या पांच बार बदला जा चुका है।
वास्तव में ये निष्कर्ष मात्र केंद्रीय मंत्रालयों की सचाई ही नहीं हैं बल्कि राज्यों के कई विभागों के कई कार्मिक भी सालों साल तक एक ही सीट पर जमे रहते हैं। इसके पीछे मकसद उस सीट पर अपनी पकड़ मजबूत कर ज्यादा से पैसे कमाने के रास्ते बनाना होता है। सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का यह एक बड़ा कारण है। बरसों तक जमे ऐसे लोग विभाग की कार्य प्रणाली की नस-नस पहचान कर उसे अपने फायदे के मुताबिक चलाते हैं। एक तरह से ये वहां के ‘मठाधीश’ हो जाते हैं। तबादला भी होता है तो अपनी इसी पकड़ के बल पर उसे अमल में नहीं आने देते। यह सरकारों की फैसला लेने और उस पर अमल कराने की क्षमता पर एक सवालिया निशान भी है।







