शिक्षा विभाग का आदेश,स्कूलों में नहीं घुसें,बजट के अभाव में कैसे रखेंगे सुरक्षाकर्मी, कैसे बनेंगी चारदीवारियां
ओम माथुर
आप किसी दिन अपने बच्चे को छोड़ने उसके स्कूल जाएं और स्कूल परिसर में घुसने से पहले देखते हो कि कोई व्यक्ति पत्थर लिए कुत्ते को भगाने के लिए उसके पीछे भागता आ रहा है। जैसे ही वो आपके पास पहुंचे,आप उसे पहचानें की वो तो आपके बच्चे की कक्षा का क्लास टीचर है। या फिर कभी आप स्कूल जाएं और स्कूल के मुख्य द्वार पर शिक्षक बैठा हुआ दिखे। आप उससे पूछे कक्षा की जगह आज आप द्वार पर क्यों बैठे हैं और वो जवाब दें कि अब अगले 7 दिन तक उसे स्कूल परिसर में कुत्तों को घुसने से रोकना है और घुस जाए,तो भगाना है।
यह कोई कल्पना नहीं है,बल्कि शिक्षा विभाग का वह नया आदेश है, जिसके तहत शिक्षकों की ड्यूटी अब स्कूल मैदान और कक्षाओं में आवारा कुत्तों और आवारा पशुओं का प्रवेश रोकने के लिए लगाई गई है। अजमेर के मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी समग्र शिक्षा ने ये आदेश जारी किया है और ऐसे आदेश राज्य के अन्य जिलों में भी जारी किए गए हैं। ये आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा आवारा कुत्तों की संख्या और काटने की घटनाएं बढ़ने को लेकर दायर याचिका पर जारी गाइड लाइन की पालना में जारी किया गया है। अब तक शिक्षक उन कामों में लगाए जाते रहे हैं, जिसमें वो लोगों से निपटते रहे हैं। लेकिन कुत्तों से सीधे निपटने में उनकी ड्यूटी पहली बार लगाई गई है। यूं भी स्कूलों में शिक्षकों से अध्यापन के अलावा बाकी सारे काम खूब कराएं जा रहे हैं। राजस्थान सरकार की योजनाओं में शिक्षकों को झोंक दिया जाता है। पशुगणना करनी हो,जनगणना करनी हो, मतदाता सूचियां बनवानी हो। एसआईआर कराना हो। योग दिवस मनाना हो। किसी महापुरुष-नेता की जयंती मनानी हो। स्कूलों में बच्चों को दूध बांटना हो,पोषाहार बांटना हो। तरह-तरह की रैलियां निकालनी हो। शिक्षक पढ़ाने का काम छोड़कर पहले इन्हें करते हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब 50 तरह के काम ऐसे हैं, जिन्हें शिक्षकों को समय-समय पर करना पड़ता है। इनके अलावा उनका मूल काम अध्यापन तो है ही,जो अब स्कूलों में मूल काम की बजाय सहायक कार्य बन के रह गया है। सरकार को भी पढ़ाई के अलावा बाकी सारे कामों की चिंता ही ज्यादा रहती है। ऐसा लगता है मानो सरकार को लगता है कि शिक्षक हर काम में दक्ष हो या फिर उसकी यह धारणा हो गई कि शिक्षक स्कूलों में पढ़ाते तो है नहीं,जब मोटा वेतन देते ही हैं,तो फिर उनसे काम तो कराया जाए। राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर तो शिक्षकों को कई बार निशाने पर लेकर उन्हें नाकारा साबित करने वाले बयान दे चुके हैं।
बहरहाल,आदेश कहता है कि सभी सरकारी,निजी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के परिसरों की बाड़ाबंदी को मजबूत किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की स्कूल के मैदान और कक्षाओं में आवारा पशुओं का प्रवेश पूरी तरह अवरुद्ध हो। इसके अलावा स्कूल खुलने और बंद होने के समय जब विद्यार्थी परिसर से बाहर निकलते हैं, सुरक्षाकर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए। ताकि आवारा कुत्तों और पशुओं के संभावित हमले से बच्चों को बचाया जा सके। निजी स्कूलों में तो इस आदेश की काफी हद तक पालना हो जाएगी, क्योंकि लगभग सभी निजी स्कूल परिसरों में ही चल रहे हैं। बड़ी निजी स्कूलों के द्वारों पर सुरक्षाकर्मी भी तैनात रहते हैं। ऐसे में कुत्तों का उनमें घुसना नामुमकिन नहीं,तो मुश्किल जरूर है। लेकिन सरकारी स्कूलों में क्या ये संभव है? गांवों की तो छोड़िए,शहरों की भी कई स्कूलों में चारदीवारी /बाड़ाबंदी तक नहीं है। स्कूल मैदान कक्षा कक्ष से जुड़े हुए हैं। दिन भर खुले स्थानों पर कुत्ते, सूअर,गाएं घूमते रहते हैं। क्या सरकार के पास इतना बजट है कि वह स्कूलों की चारदीवारी बना सके या फेंसिंग करा सके। राज्य में हजारों स्कूल भवन जीर्ण शीर्ण अवस्था में चल रहे हैं। जहां बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ाई कर रहे हैं। जब उनकी मरम्मत ही नहीं हो पा रही है,तो फिर चारदीवारी या फेंसिंग की बात करना बेमानी है। इसके अलावा क्या सुरक्षाकर्मियों को देने के लिए पैसे सरकार देगी या स्कूलों के पास इतना फंड है कि वह आवारा कुत्तों को रोकने के लिए सुरक्षाकर्मी को वेतन दे सके।
आदेश में हर स्कूल को इसके लिए एक शिक्षक को नोडल अधिकारी नियुक्त करने के लिए कहा गया है, जो अन्य विभागों से आवारा कुत्तों और जानवरों की रोकथाम के लिए संबंध स्थापित करेगा। इसका नाम और टेलीफोन नंबर स्कूल के मुख्य द्वार पर भी लिखा जाएगा। यानी स्कूल के किसी एक अध्यापक को बच्चों के साथ-साथ आवारा कुत्तों का भी ध्यान रखते हुए दोहरी जिम्मेदारी निभानी होगी। हो सकता है कि कल कोई अभिभावक अपने बच्चे से यही यह सवाल पूछ ले कि तुम्हारा क्लास टीचर तो यह है। तुम्हारे स्कूल में डॉग कंट्रोल टीचर कौन है। वैसे सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अपनी सुनवाई में शैक्षिक संस्थानों के अलावा अस्पतालों,अदालत परिसरों, रेलवे स्टेशनों आदि से भी आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। लेकिन अब तक इन्हें लेकर चिकित्सा विभाग, न्यायिक प्रशासन विभाग या रेलवे ने कोई आदेश जारी नहीं किए हैं। जबकि स्कूल परिसरों से ज्यादा आवारा कुत्ते आपको अस्पतालों और स्टेशनों पर घूमते और लोगों को परेशान करते नजर आ जाएंगे। चाहेऔ तो कभी भी अजमेर के जेएलएन अस्पताल या रेलवे स्टेशन जाकर आ जाइए हकीकत नजर आ जाएगी।







