आखिर कैसे बन जाते हैं इनके आधार कार्ड,वोटिंग कार्ड और राशन कार्ड
ओम माथुर
अजमेर पुलिस ने आज तीन थाना क्षेत्र में अभियान चलाकर चार सौ से ज्यादा संदिग्ध बांग्लादेशियों व रोहिंग्याओं को पकड़ा है। इनके दस्तावेजों की जांच की जा रही है। इनमें से कई बांग्लादेशी अर्से से अजमेर में बसे हुए हैं। पुलिस ने जनता कॉलोनी, ईदगाह कॉलोनी,चौधरी कॉलोनी सहित आसपास के क्षेत्र तथा दरगाह के आसपास के क्षेत्र में इनकी धरपकड़ के लिए अभियान चलाया था। अजमेर में बांग्लादेशियों का अवैध रूप से बसना और सालों से यहां रहना कोई नई बात नहीं है। शहर के चारों ओर अभी भी सैंकड़ों संदिग्ध बांग्लादेशी अवैध रूप से बसे हुए हैं। अचरज इस बात का है अधिकांश बांग्लादेशियों के पास भारतीय नागरिक होने के पहचान के वैद्य प्रमाण है। यानी आधार कार्ड, वोटिंग आईडी, पैन कार्ड राशन कार्ड आदि-आदि।
दरअसल,बांग्लादेशियों को पकड़कर वापस बांग्लादेश भेजने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि सीआईडी और पुलिस भी इन्हें पकड़ने के लिए निरंतर अभियान नहीं चलाती है। शहर में किसी बड़ी आपराधिक घटना या देश में किसी आतंकी हमले के बाद बांग्लादेशियों पर शिकंजा कसना शुरू किया जाता है। लेकिन कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। अभी पहलगाम में आतंकी हमले के बाद राजस्थान सहित कई राज्यों में इनकी धरपकड़ की जा रही है। अवैध रूप से रहने के बावजूद पुलिस इन्हें महज शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर सकती है। उसके बाद इनके दस्तावेजों की जांच की जाती है और दस्तावेज फर्जी होने की पुष्टि होने के बाद इन्हें तब तक डिटेंशन सेंटर में रखा जाता है, जब तक डिपोर्ट न कर दिया जाए। ताज्जुब की बात ये है कि बड़ी संख्या में अजमेर में बांग्लादेशियों के रहने के बावजूद यहां कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है। राजस्थान में केवल अलवर में ही इन्हें रखने के लिए डिटेंशन सेंटर बना हुआ है। पहलगाम हमले के बाद बांग्लादेशियों की राज्य भर में खोज की जा रही है। इनमें से जो भी बांग्लादेशी होंगे,उसे पहले अलवर भेजा जाएगा। लेकिन अब वहां भी जगह कम पड़ने लगी है। इसलिए सरकार जयपुर में एक और डिटेशन सेंटर खोलने के प्रयास में है।
सवाल ये नहीं है कि यह बांग्लादेशी अजमेर या अन्य शहरों तक पहुंच यहां ठिकाना कैसे बना लेते हैं। सवाल ये है कि यहां आने के बाद इनके वैध दस्तावेज तैयार करने में कौन मदद करता है। कौन इन्हें बसाता है। वोटर आईडी, आधार कार्ड या अन्य दस्तावेज बनवाना कोई आसान काम नहीं है।आखिर इन्हें बनवाने वाले भी किसी गिरोह के रूप में ही काम करते होंगे। और इसमें सरकारी मशीनरी के लोग भी शामिल होते हैं। पैसा देकर हमारे देश में कोई भी अवैध काम तुरंत कराया जा सकता है। जबकि कानूनध सही काम को कराने में पसीने छूट जाते हैं। पुलिस को इन दस्तावेजों को बनवाने के लिए उन पर हस्ताक्षर करने या उनकी पुष्टि करने वालों के खिलाफ भी जांच करनी चाहिए,क्योंकि वो भी इसके बराबर के जिम्मेदार हैं। पैसों और मिलीभगत के दम पर तैयार ऐसे दस्तावेजों के कारण ही यह बांग्लादेशी भारतीय नागरिकता के प्रमाण व पहचान प्राप्त कर लेते हैं। पुलिस और प्रशासन को सिस्टम से ऐसी गंदी मछलियों को पकड़ना चाहिए,जो दूसरे देश के नागरिकों को हमारे देश पर बोझ बनाने के साथ ही सुरक्षा के लिए भी खतरा बढ़ा रहे हैं। पिछले दिनों चले अभियान में भी कई संदिग्ध बांग्लादेशी पकड़े गए थे। लेकिन इनमें से अधिकांश के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी जैसे दस्तावेज थे।
अजमेर में पहले माना जाता था कि दरगाह और उसके आसपास के इलाकों में ही बांग्लादेशी रहते हैं। लेकिन अब जिस तरह से इन्होंने शहर के चारों ओर के प्रवेश मार्गों और शहर के बाहरी इलाकों में अपनी बसावट और तादाद बढाई है,वो भविष्य के लिए और भी खतरनाक संकेत दे रही है। ये महज संयोग भी हो सकता है या खुराफाती दिमाग वालों का प्रयोग भी।दरगाह के आसपास अधिकांश संपन्न मुस्लिम परिवारों में बांग्लादेशी ही घरेलू नौकर-नौकरानियां हैं। इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में बांग्लादेशी महिलाएं लोगों के घरों में काम कर रही है। जबकि इनके पति और अन्य पुरुष निर्माण कार्यों में मजदूरी करते हैं। ई रिक्शा चलाते हैं। इन्हें काम मिलने में इसलिए भी आसानी होती है कि है क्योंकि ये कम मजदूरी पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। आसपास के लोगों द्वारा पूछने पर ये खुद को पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश का निवासी बताते हैं।
पुलिस भी मानती है कि शहर में अधिकांश आपराधिक घटनाओं में बांग्लादेशियों का हाथ होता है। विशेष रूप से घरों में नौकर बनकर ये वहां से चोरी करके चंपत हो जाते हैं। पुलिस के बार-बार कहने पर भी मकान मालिक किराएदारों का सत्यापन नहीं कराते हैं। इसलिए इनका बचना आसान रहता है। अजमेर आने वाले अधिकांश बांग्लादेशी पश्चिम बंगाल,त्रिपुरा और असम के रास्ते बहुत कम पैसे देकर सीमा पार कर अजमेर पहुंचते हैं। सीमा पार करना कितना आसान होता है,इसका खुलासा पिछले दिनों अजमेर में ही पकड़े एक बांग्लादेशी ने किया था। जो डिपोर्ट होने के बाद भी दोबारा भारत और फिर अजमेर आ गया था। जब तक इन्हें दाना-पानी देने और इनका पालन- पोषण करने वालों के खिलाफ पुलिस और प्रशासन धावा नहीं बोलेगा, बांग्लादेशियों को शहर से निकालना आसान नहीं होगा। इसके लिए एक स्थाई टीम का गठन भी किया जा सकता है। जो संदिग्ध बांग्लादेशियों के रहने वाले इलाकों,निर्माण कार्य स्थलों पर निरीक्षण कर निरन्तर जांच कर इनकी धरपकड़ कर खदेडती रहे।







