रोंगटे खड़े कर देने वाली पुनर्जन्म की सच्ची कहानी: वह सुमित्रा थी या शिवा?
इटावा, उत्तर प्रदेश: क्या आपने कभी सोचा कि मृत्यु के बाद भी कोई अपनी कहानी को जीवित रख सकता है? उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 1985 में घटी एक ऐसी घटना ने न सिर्फ स्थानीय लोगों को, बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया। यह है सुमित्रा सिंह की कहानी, जो मरकर भी जी उठी, लेकिन इस बार एक नई पहचान शिवा त्रिपाठी के साथ मिली। सनातन धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता को साकार करती यह कहानी आज भी रहस्य और आश्चर्य से भरी है।
सुमित्रा का जीवन: तन्हाई से भरा बचपन
1968 में इटावा के शरीफपुरा गाँव में एक साधारण ठाकुर परिवार में जन्मी सुमित्रा का बचपन आसान नहीं था। माँ की जल्दी मृत्यु और पिता के दिल्ली में काम करने के कारण वह अकेलेपन की साये में पली। 13 साल की नन्ही उम्र में उनकी शादी जगदीश सिंह से हो गई, जो अक्सर काम के लिए बाहर रहते थे। इस अकेलेपन में सुमित्रा को एकमात्र सहारा मिला 1984 में, जब उन्होंने अपने बेटे को जन्म दिया। यह बच्चा उनकी जिंदगी में पहली बार सच्ची खुशी लाया। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी।
रहस्यमयी दौरे और भयावह भविष्यवाणी
1985 की गर्मियों में, जब सुमित्रा कुएँ से पानी ला रही थी, उनके साथ कुछ अजीब हुआ। उनके हाथ बेकाबू होकर ऊपर उठे, आँखें घूमने लगीं, और वह काँपते हुए जमीन पर गिर पड़ीं। यह दौरा कोई एक बार की बात नहीं थी ! अगले पाँच महीने तक यह बार-बार दोहराया गया। परिवार घबरा गया, और सुमित्रा अपने बेटे से भी दूर होती चली गई। फिर, 16 जुलाई 1985 को, एक दौरे के बीच उन्होंने कुछ ऐसा कहा, जिसने सबको स्तब्ध कर दिया: “तीन दिन बाद मैं मर जाऊँगी।” ठीक 19 जुलाई 1985 को, एक दोस्त से हँसते-बात करते हुए, वह अचानक खड़ी हुईं और उनकी साँसें थम गईं। उनकी भविष्यवाणी सच हो गई थी।
मौत को मात: सुमित्रा का पुनर्जनन
उस समय अंतिम संस्कार की तैयारियाँ चल रही थीं। गाँव की महिलाएँ सुमित्रा के शव के पास थीं, फिर अचानक से 45 मिनट बाद सुमित्रा की आँखें खुलीं। लेकिन यह क्या – सुमित्रा अब पहले वाली सुमित्रा नहीं थी, वह पूरी तरह से बदल गयी थी। यहाँ तक वह अपने पति, अपने घर वाले, और यहाँ तक कि अपने नवजात बेटे को भी नहीं पहचान रही थी। वह बार-बार कागज-कलम माँगती और पत्र लिखकर पति से डाक में डालने को कहती। गाँव वाले हैरान थे ! यह क्या हो रहा है?
तीन महीने बाद, 20 अक्टूबर 1985 को, एक अनजान व्यक्ति, राम सिया त्रिपाठी, उनके घर पहुँचा। सुमित्रा ने उसे देखते ही भावुक होकर अपने गले लगाया और कहा, “बाबू जी, मैं आपकी पुत्री शिवा हूँ।” उस समय राम सिया ने एक पुराना फोटो एल्बम निकाला, जिसमें उनकी बेटी शिवा की शादी की तस्वीरें थीं। सुमित्रा ने हर चेहरा अच्छी तरह और सटीक पहचाना, शिवा का पति छेदीलाल, बेटे रिंकू और टिंकू, और यहाँ तक कि ननद को भी।
फिर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ: सुमित्रा ने दावा किया कि 19 जुलाई 1985 को उनकी ननद ने उनके सिर पर पत्थर मारकर उनकी हत्या कर दी थी।
शिवा की दर्दनाक कहानी
राम सिया ने बताया कि उनकी बेटी शिवा का जन्म 1962 में इटावा के डिबियापुर गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पढ़ी-लिखी शिवा की शादी छेदीलाल से हुई थी, लेकिन ससुराल में दहेज की माँग और कम पढ़े-लिखे रिश्तेदारों के बीच उनकी जिंदगी दुखों से भरी थी। 18 जुलाई 1985 को शिवा की रहस्यमयी मौत हुई, और ससुराल वालों ने उनके शव को रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया। शिवा के पिता ने हत्या का मुकदमा दर्ज कराया, लेकिन सबूतों की कमी के कारण कोई सजा नहीं हुई।
वैज्ञानिकों का हस्तक्षेप
यह कहानी जल्दी ही चर्चा का विषय बन गई। अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के पुनर्जन्म विशेषज्ञ, इयान स्टीवंसन और उनकी टीम, इस मामले की जाँच के लिए भारत आए। उन्होंने सुमित्रा (अब शिवा) के दावों, उनके द्वारा दी गई जानकारी, और हैंडराइटिंग का विश्लेषण किया। नतीजा? यह दुनिया का पहला ऐसा पुनर्जन्म का मामला था, जिसे वैज्ञानिक तथ्यों ने सत्यापित किया। सुमित्रा अब शिवा के रूप में अपने पिता और बेटों रिंकू-टिंकू के साथ रहने लगी, और आश्चर्यजनक रूप से सुमित्रा के पति जगदीश और बेटे को भी अपनाकर एक नया परिवार बना लिया।
नहीं मिले कुछ अनसुलझे सवालों के जवाब
1998 में सुमित्रा (शिवा) की बीमारी से मृत्यु हो गई, और कुछ समय बाद जगदीश भी चल बसे। लेकिन उनकी कहानी आज भी जीवित है, जो पुनर्जन्म के रहस्य को उजागर करती है। क्या यह वाकई आत्मा का एक शरीर से दूसरे में प्रवेश था? या कोई ऐसी शक्ति, जिसे विज्ञान पूरी तरह समझ नहीं पाया? – प्रस्तुति: सुशील कुमार







