वक़्त ही है दोस्त
वक़्त ही है दुश्मन
ज़िन्दगी में
बाकी
सब केवल सम्मोहन
कोई भी चीज
अपनी जगह पर
सलामत नहीं
प्यार, मुहब्बत, इज्जत, चाहत
इनका कोई मूल्य नहीं
पेड़ चुप
पंछी चुप
ये कैसा उपवन
शब्दों ने बदल
दिये अर्थ
अर्थ ने बदले परिधान
पीठ पीछे घोपे खंज़र
पर निकले मूछें तान
मित्र शत्रु,
शत्रु मित्र बना
रचा ये कैसा रण
– आनंद अभिषेक
Add A Comment







