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    अकबर शासन के विशेष संरक्षण पर तुलसी ने पूर्ण किया ‘मानस’ का सृजन

    ShagunBy ShagunApril 4, 2026 ब्लॉग No Comments8 Mins Read
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    Tulsi completed his creation of 'Manas' under the special patronage of Akbar's rule.
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    काश आज भी कोई संत मस्जिद में और कोई रसखान मंदिर में निष्फिक्र हो पुनः रच सकें मानवता और प्रेम का अध्याय

    राहुल कुमार गुप्ता

    इतिहास की धूल भरी परतों के नीचे अक्सर वे सच दबे होते हैं, जो वर्तमान की नफरत भरी दीवारों को ढहाने का माद्दा रखते हैं। सोलहवीं शताब्दी के भारत की उन गलियों में जब हम मानसिक पदयात्रा करते हैं, तो वहाँ केवल तलवारों की खनक ही नहीं सुनाई देती और न ही केवल महलों का वैभव ही दिखाई देता, बल्कि एक ऐसे महाकवि का मौन और प्रखर संघर्ष भी दिखाई देता है जिसने अपनी लेखनी से भारतीय जनमानस की आत्मा को सींच दिया। गोस्वामी तुलसीदास, जिन्हें आज हम सनातन संस्कृति के शिखर पुरुष के रूप में पूजते हैं, उनका जीवन किसी कठिन वैचारिक और सामाजिक युद्ध से कम नहीं था। आज उनके द्वारा अवधी भाषा में लिखी गई रामचरित मानस हर सनातनियों के घरों के पूजा स्थल में अनिवार्य रूप से पाई जाती है। लेकिन इस पावन ग्रन्थ की रचना में कितने गंभीर संकट खुद अपनों ने खड़े किए ये वैसे किसी से छिपा नहीं, लेकिन हम उस समय के विद्रोह और रूढ़िवाद को आसानी से भूल गए, वजह ये रूढ़िवाद और विद्रोह अपनों के ही अहं से उपजा था। इस संकट को दूर कर श्री राम चरित मानस में नायक की तरह सामने आने वाला कोई गैर धर्म का था।

    सम्राट अकबर! जी हां! अगर सम्राट अकबर का संरक्षण और सहायता न मिलती तो काशी के प्रतिष्ठित धर्माचार्य और तत्कालीन अभिजात्य वर्ग तुलसीदास जी को गोस्वामी बनने का मौका ही नहीं देते। वो उन्हें अधर्मी कह कर उन्हें समाज से बहिष्कृत कर चुके थे। अमृतलाल नागर ने अपने कालजयी उपन्यास ‘मानस के हंस’ में तुलसीदास के जीवन के उन कड़वे और उद्वेलित करने वाले प्रसंगों को उकेरा है, जो आज के सांप्रदायिक और ध्रुवीकृत समाज के लिए एक अनिवार्य दर्पण हैं। यह आलेख उस समय की उन विरल कड़ियों को जोड़ने का प्रयास है जहाँ धर्म की संकीर्ण दीवारें नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उदार सेतु बने थे।

    तुलसीदास जी का अयोध्या प्रवास केवल एक आध्यात्मिक साधना नहीं थी, बल्कि वह तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक सड़ांध के विरुद्ध एक साहसी बौद्धिक विद्रोह का काल था। सन् 1574 के आसपास जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना का संकल्प लिया, तब अयोध्या और काशी के मठों में धर्म के नाम पर पाखंड और अनाचार अपनी जड़ें जमा चुका था। उन मठों में, जिन्हें नैतिकता और ज्ञान का केंद्र होना चाहिए था, देवदासी और देवकन्या जैसी कुप्रथाओं की आड़ में महिलाओं और मासूमों का भीषण शोषण हो रहा था। यहाँ तक कि मठाधीशों द्वारा सत्ता के मद में दुराचार के हृदयविदारक प्रसंग भी समाज की संवेदनहीनता की गवाही देते थे। जब तुलसीदास ने भक्ति के साथ-साथ इस सामाजिक गंदगी के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की, तो उन्हें धर्मरक्षक कहने के बजाय विद्रोही और मर्यादाहीन करार दिया गया।Tulsi completed his creation of 'Manas' under the special patronage of Akbar's rule.

    अपनों ने ही उन्हें पीटा, अपमानित किया और समाज से इस कदर बहिष्कृत किया कि उन्हें सिर छुपाने के लिए जगह तक मयस्सर न थी। यहीं से उस ऐतिहासिक विरोधाभास की शुरुआत होती है जिसे आज की संकीर्ण राजनीति शायद ही स्वीकार कर पाए, जब अपनों ने मंदिर के दरवाजे बंद किए, तब एक मस्जिद ने उन्हें पनाह दी। तुलसीदास ने स्वयं ‘विनय पत्रिका में निर्भीकता से स्वीकार किया कि वे मस्जिद में सो सकते हैं और उन्हें किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। एक सनातनी संत का मस्जिद की छाँव में बैठकर राम की अमर गाथा लिखना उस युग की धार्मिक व्यापकता और भारत की असली सुलह-ए-कुल संस्कृति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

    संघर्ष केवल सामाजिक स्तर पर नहीं था, बल्कि वह भाषाई और बौद्धिक भी था। काशी के पंडित इस बात से क्षुब्ध थे कि तुलसीदास देववाणी संस्कृत के अभिजात्यवाद को त्यागकर लोकभाषा अवधी में रामायण लिख रहे थे। उनके लिए यह ईश्वर का अपमान था, जबकि तुलसी के लिए यह राम को आम आदमी के हृदय तक पहुँचाने का जरिया था। इस विकट घड़ी में राजा टोडरमल का उदय एक रक्षक के रूप में होता है। अकबर के नवरत्नों में शामिल, अकबर के वित्त मंत्री और बनारस के सामंत टोडरमल ने तुलसी की मेधा और उनके साथ हो रहे अन्याय को पहचाना।

    उन्होंने न केवल अस्सी घाट पर तुलसी की कुटी बनवाई, बल्कि अपनी सेना के सशस्त्र लठैत उनकी सुरक्षा में तैनात कर दिए ताकि कोई कट्टरपंथी उनकी लेखनी को खामोश न कर सके। यह वह ऐतिहासिक सत्य है जो बताता है कि महान सृजन को अक्सर सत्ता और समन्वय के संरक्षण की आवश्यकता होती है। सम्राट अकबर की उदार नीति और टोडरमल की सूझबूझ ने वह परिवेश निर्मित किया जिसमें रामचरितमानस जैसा पावन ग्रंथ आकार ले सका। यदि उस समय अकबर की व्यवस्था में इतनी गुंजाइश न होती कि एक विद्रोही संत को सुरक्षा मिल सके, तो शायद आज हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध न होती।

    भक्ति काल का वह दौर वास्तव में सांस्कृतिक मिलन का महाकुंभ था, जहाँ हिंदू और मुस्लिम पहचानें एक-दूसरे में विलीन हो रही थीं। जहाँ एक ओर तुलसीदास मस्जिद में शरण ले रहे थे, वहीं दूसरी ओर अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना (रहीम) जैसे मुस्लिम सिपहसालार और कवि तुलसी के साथ दोहों के माध्यम से आत्मीय संवाद कर रहे थे। रसखान जैसे पठान जब कृष्ण की भक्ति में यह कहते थे कि “मानुस हों तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन”, तो वे धर्म की सीमाओं को लाँघकर एक साझा मानवीय धरातल पर खड़े होते थे। काशी में बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर का जीर्णोद्धार भी अकबर के संरक्षण में टोडरमल और राजा मान सिंह ने कराया। अकबर के काल में सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ को मुंह तोड़ जवाब मिलता रहा।

    मुहम्मद बिन तुगलक और अकबर ने सती प्रथा रोकने के भी भरसक प्रयास किए। समाज में सुधार को लेकर भक्ति काल मानवता स्थापित करने का काल था। मीराबाई का राजसी सत्ता के खिलाफ विद्रोह हो या कबीर का ‘काँकर पाथर जोरि कै’ कहकर बाह्य आडंबरों पर प्रहार ! यह पूरा कालखंड संस्थानों के भीतर की गंदगी को साफ करने का आंदोलन था। भक्ति आंदोलन के इन संतों ने सिखाया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए कट्टरता नहीं, बल्कि करुणा और ईमानदारी की जरूरत है।

    आज का समाज तकनीक और सूचना में तो बहुत आगे बढ़ गया है, लेकिन वैचारिक सहिष्णुता के मामले में हम निरंतर संकुचित हो रहे हैं। आज भी जब कोई व्यक्ति अपने समुदाय की कुरीतियों के खिलाफ बोलता है, तो उसे गद्दार या अधर्मी करार देने की होड़ मच जाती है। हम अपनी कमियों को सुधारने के बजाय दूसरे धर्मों को नीचा दिखाने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं। तुलसीदास, कबीर और मीरा का जीवन हमें याद दिलाता है कि वास्तविक धर्म अपनी कमियों को स्वीकार करने और उनके खिलाफ खड़े होने का साहस है।

    वर्तमान के बढ़ते सांप्रदायिक बैर को खत्म करने का एकमात्र मार्ग वही मसीत और कुटी का समन्वय है। भारत की महानता किसी एक संप्रदाय की पूर्ण विजय में नहीं, बल्कि उन धागों में है जो विभिन्न आस्थाओं को एक ही रामराज्य की कल्पना में पिरोते हैं।

    रामचरितमानस का अस्तित्व इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि जब मस्जिद की छत, अकबर-टोडरमल की सुरक्षा और तुलसी की साधना एक साथ मिलते हैं, तभी कोई कालजयी सत्य जन्म लेता है। आज के इस ध्रुवीकृत दौर में हमें फिर से उसी इबादतखाने की मानसिकता की जरूरत है, जहाँ सत्य की खोज सर्वोपरि हो, न कि नफरत का प्रचार। नफरत की राजनीति क्षणभंगुर हो सकती है, लेकिन समन्वय का यह साझा इतिहास ही हमारे कल का एकमात्र सहारा है। आज हमारे महान संविधान के दौर में जिसमें समता का भाव मूल में है और इसके क्रियान्वयन और संरक्षण के लिए शासन प्रशासन, न्यायपालिका जैसे विकसित और शक्ति संपन्न तंत्र क्रियाशील हैं तब भी सहिष्णुता और कट्टरता सभी संप्रदायों में कम या ज्यादा देखने को मिलती है, क्योंकि धर्म आज भी प्रभावी है।

    इतिहास में सहिष्णुता और कट्टरता के उदाहरण मात्र एक पक्ष के हिस्से में ही नहीं है वरन् ये सबके हिस्से में है। सनातन के हिस्से में आज भी सहिष्णुता का भाव सर्वाधिक है, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना सनातन का आधार है। लेकिन सबके अपने अपने अहंकार के चलते आज आपस में वैचारिक मतभेद इतने अधिक हो गए हैं कि इसके लिए जल्द सुधार की ज्योति न जलाई गई तो अंधकार निश्चित ही अपना आधिपत्य जमा लेगा।

    जहां इतिहास का एक दौर समन्वयवादी संस्कृति को बढ़ावा देता नज़र आता है वहीं दूसरी ओर इतिहास का एक दौर (जैसे लीग का कार्यवाही दिवस) माेपला विद्रोह, आदि एक वर्ग की कट्टरता और नृशंसता का वीभत्स उदाहरण देता भी नज़र आता है। केवल किसी एक पक्ष के सुधार से खुशहाल संस्कृति का जन्म नहीं होने वाला। दो बड़े वर्गों के बीच आज सांप्रदायिकता की जो आंधी दिख रही है वो मात्र आज की देन नहीं है, इस आंधी में बहने की बजाय दोनों पक्षों को अतीत में हुई गलतियों को वर्तमान में सुधारने का प्रयास करना होगा। तभी आज भी कोई संत मस्जिद में और कोई रसखान मंदिर में निष्फिक्र हो मानवता और प्रेम का अध्याय पुनः रच सकें, जिससे विश्व और समाज में खुशहाली की संस्कृति पुनः जन्म ले सके।

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