भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ जारी किए हैं। ये दिशानिर्देश 2012 के पुराने नियमों का अपडेटेड संस्करण हैं, जिनका उद्देश्य कैंपस में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। सरकार का दावा है कि ये नियम समाज के हित में हैं, जो समानता और समावेशिता को बढ़ावा देंगे। लेकिन इनके जारी होने के बाद से ही देशभर में विरोध प्रदर्शन, इस्तीफे और कानूनी चुनौतियां सामने आ रही हैं। सवाल उठता है: अगर ये नियम समाज के भले के लिए हैं, तो इतना विरोध क्यों? क्या ये वाकई समान हैं, या अनजाने में विभाजन पैदा कर रहे हैं?UGC के नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को स्पष्ट किया गया है, लेकिन इसमें केवल SC, ST और OBC वर्गों को ही ‘पीड़ित’ के रूप में शामिल किया गया है। सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों को इस परिभाषा से बाहर रखा गया है, जिसका मतलब है कि वे जातिगत भेदभाव की शिकायत नहीं कर सकते।
विरोध करने वाले, खासकर ऊपरी जातियों के संगठन जैसे ‘सवर्ण सेना’, का कहना है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का खतरा बढ़ेगा। वे तर्क देते हैं कि नियमों में झूठी शिकायतों पर कोई सजा का प्रावधान नहीं है, जो दुरुपयोग को बढ़ावा दे सकता है।
उदाहरण के लिए, अगर कोई आरक्षित वर्ग का छात्र सामान्य वर्ग के छात्र पर आरोप लगाए, तो जांच तुरंत शुरू हो जाएगी, लेकिन अगर आरोप गलत साबित हुआ, तो शिकायतकर्ता पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। इससे कैंपस में डर और अविश्वास का माहौल बन सकता है।विरोध की जड़ में संवैधानिक चिंताएं भी हैं। कई आलोचक कहते हैं कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (जाति के आधार पर भेदभाव निषेध) का उल्लंघन करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका में तर्क दिया गया है कि नियम ‘नॉन-इनक्लूसिव’ हैं, क्योंकि वे सामान्य वर्ग को संस्थागत सुरक्षा नहीं देते।
इसके अलावा, नियमों में धार्मिक आधार पर शिकायतों का प्रावधान शामिल है, जो कई राज्यों में OBC में शामिल मुस्लिम समुदायों को ध्यान में रखते हुए, रूपांतरण (कन्वर्जन) से जुड़ी गतिविधियों के दुरुपयोग की आशंका पैदा करता है।
आदिवासी इलाकों में मिशनरी गतिविधियों का इतिहास देखते हुए, विरोधी तर्क देते हैं कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाने का हथियार बन सकते हैं।शिकायतों पर कार्रवाई की समयसीमा भी विवादास्पद है: शिकायत मिलने के 24 घंटे में जांच शुरू करनी होगी, रिपोर्ट 15 दिनों में, और कार्रवाई 7 दिनों में।
इसमें एनजीओ, पुलिस और सिविल सोसाइटी के सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान है, जो कैंपस को राजनीतिक अखाड़ा बना सकता है। आलोचक कहते हैं कि ये नियम पहले से मौजूद SC/ST एक्ट की तरह दुरुपयोगी साबित होंगे, जहां ‘गिल्टी अनटिल प्रूवन इनोसेंट’ का सिद्धांत लागू होता है।
उत्तर प्रदेश में BJP के कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफे और बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा इसी असंतोष का नतीजा है।
सोशल मीडिया पर #UGC_RollBack हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जहां लोग इसे ‘राजनीतिक लाभ के लिए जातिगत विभाजन’ बता रहे हैं।
सरकार का इरादा भले ही नेक हो, लेकिन विरोध बताता है कि अच्छे इरादों वाले कानून भी अगर असंतुलित हों, तो समाज में दरार पैदा कर सकते हैं। ये नियम समानता की बजाय ‘ओप्रेसर vs ओप्रेस्ड’ की काल्पनिक लड़ाई को संस्थागत रूप दे रहे हैं, जो शिक्षा के माहौल को जहरीला बना सकता है।
क्या UGC ने ये नियम बनाने से पहले सभी पक्षों की राय ली? या ये सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले की आड़ में जल्दबाजी में लागू किए गए? सरकार को चाहिए कि इन पर पुनर्विचार करे, झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान जोड़े और सभी वर्गों को समान सुरक्षा दे। वरना, समाज के हित के नाम पर लाए गए ये नियम उल्टा समाज को तोड़ने का काम करेंगे। उच्च शिक्षा ज्ञान का मंदिर है, न कि जातिगत राजनीति का मैदान।







