उपेन्द्र नाथ राय
लखनऊ। उप्र और बिहार में राजनीति को प्रभावित करने में सक्षम एक वर्ग भू-ब्राह्मण है। जाति से ब्राह्मण, व्यवहार में क्षत्रित्व का गुण। अंग्रेज विद्वान बींस ने लिखा है, “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर जाति है, जिसमें आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान हैं। ये स्वभाव से निर्भिक व हावी होने वाले होते हैं। यह भूमिहार जाति पर ज्यादा सटिक बैठता है। कहा जाता है कि यदि एक गांव में एक परिवार भी भूमिहार हो तो वह दूसरों पर हावी होने की क्षमता रखता है। एक तो यह कारण भी हो सकता है कि जिस गांव में भूमिहार होगा, उस गांव में क्षत्रीय नहीं होता, क्योंकि दोनों ही लड़ने में माहिर जातियां हैं।
आन-बान-शान से समझौता नहीं
बिहार सरकार ने 2023 में जातिगत आधारित सर्वेक्षण प्रकाशित किये, जिसमें भूमिहार समाज के 8,38,447 परिवार थे। हालांकि इस गणना पर भी बहुतेरे लोग अंगुली उठाते हैं। मिलनसार लेकिन अपनी आन-बान-शान से कोई समझौता नहीं। हां, बात कर रहे हैं भूमिहार जाति की। भगवान परशुराम के वंशज भूमिहार अर्थात भू-ब्राह्मण जाति के लोग पूरे भारत में फैले हुए हैं। विभिन्न टाइटल हैं। पटना में मेडिकल क्षेत्र में, प्रापर्टी डीलर के रुप में भूमिहारों का दबदबा है। उप्र में भी सौ से अधिक विधानसभाओं में भू-ब्राह्मण वर्ग के लोगों का दबदबा रहता है। वहीं बिहार में लगभग आधी सीटों पर राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन बिखराव के कारण अब पार्टियों में इनका वर्चस्व कम होता जा रहा है।
अयाचक ब्राह्मण यानि भूमिहार
ब्राह्मणों के कर्म विभाजन से मुख्यत: दो शाखाएं आयीं- पहला पौरोहित्यकर्मी या कर्मकांडी याचक एवं अध्येता और दूसरा यजमान या अयाचक। जो याचक रहे वे याचक ब्राह्मण हुए और जो अयाचक अर्थात दान-दक्षिणा नहीं लेते वे ही आगे चलकर भूमिहार कहलाए। दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुसार अयाचकता और याचकता किसी विप्र समाज या जाति का धर्म न होकर व्यक्ति का धर्म है। जो आज अयाचक हैं वे चाहें तो कल याचक हो सकते हैं। उनकी इसी बात से प्रभावित होकर आज भी बिहार के बक्सर जिले का सतसेमरी गांव में भूमिहार समाज के कुछ लोग पूजा पाठ कराने का काम करते हैं तो कुछ लोग दाह संस्कार में महा ब्राह्मण का काम भी करते हैं। यही नहीं प्रयागराज में जो पंडा हैं, वे सभी लोग भू-ब्राह्मण समाज से ही आते हैं।

रामायण में भी है अयाचक ब्राह्मण का जिक्र
स्वामी सहजानंद सरस्वती के वक्तव्य की पुष्टि वाल्मिकी रामायण के अयोध्याकांड के बत्तीसवें सर्ग के 29-43वें श्लोक में गर्ग गोत्रियत्रिजट नामक ब्राह्मण की कथा से अयाचक से याचक बनने की मिलती है। इसमें लिखा है-
तत्रासीत् पिंगलो गार्ग्य: त्रिजटो नाम वै द्विज, क्षतिवृत्तर्वने नित्यं फालकु द्दाललांगली।।
अर्थात दान लेना स्थितिजन्य है और समयानुसार याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं। इसी तरह द्वापर काल में युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा गोधन आदि भूसंपदा के उपहार और दान का वर्णन दुर्योधन द्वारा शकुनी के समक्ष किया गया है। यद्यपि अयाचक ब्राह्मणों अर्थात भूमिहारों द्वारा राज्याधिकार और राज्य का संचालन हरेक युग में होता आया है लेकिन चौथी और पांचवी सदी से यह कार्य बहुत प्रचलित हो गया। 330 ईशापूर्व में सिकंदर से लोहा लेने वाले सारस्वत गोत्रीय महियाल ब्राह्मण पोरस, 700 ईश्वी में राजा छाच, अफगानिस्तान में जयपाल, आनंदपाल आदि महियाल ब्राह्मण राजा के नाम आते हैं।
1865 में पहली बार आया जिक्र
हालांकि भूमिहार शब्द का पहला जिक्र बृहतकान्यकुब्जबंशावली 1526 ई. में आता है लेकिन सरकारी अभिलेखों में प्रथम प्रयोग 1865 की जनगणना रिपोर्ट में हुआ है। इसके पहले गैर सरकारी रूप में इतिहासकार बुकानन ने 1807 में पूर्णिया जिले की सर्वे रिपोर्ट में लिखा है, “भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति है है, जो अपने शौर्य पराक्रम और बुद्धिमत्ता के लिए जानी जाती है।” एम. ए शेरिंग ने 1872 में अपनी पुस्तक हिन्दू ट्राइब्स एंड कास्ट में कहा है कि भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राह्मण हैं। अंग्रेज विद्वान बींस ने लिखा है, “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर जाति है, जिसमें आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान हैं। ये स्वभाव से निर्भिक व हावी होने वाले होते हैं।
झगड़ा करने में भी नहीं रहते हैं पीछे
ऐसा कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने जब क्षत्रिय वंश का नाश करने निकले तो उनकी जमीन पर ब्राह्मण वंश के उन परिवारों को बसाया जो दूसरों के यहां जाकर पूजा पाठ कराने में विश्वास नहीं रखते थे। दान-दक्षिणा नहीं लेते थे। उन लोगों को भगवान परशुराम ने खेती के लिए जमीन दी और वे लोग उसी से अपनी आजीविका चलाने लगे। खेत पर कोई दूसरा कब्जा न कर ले, इसके लिए क्षत्रीत्व का गुण भी जरूरी था। इस कारण झगड़ा करने में भी पीछे नहीं रहे।
भूमि अग्रहार ब्राह्मण भी कहते हैं इन्हें
एक वर्ग का यह मानना है कि भूमिहार शब्द ही गलत है। यह ब्राह्मणों की एक शाखा है, भूमि अग्रहार ब्राह्मण कहना उपयुक्त होगा। इन्हें वीरता के फलस्वरूप भूमि मिली थी, जो आज तक कायम है। आज भी भूमिहार अपनी वीरता और ज्ञान के लिए ही जाना जाता है। जहां भी भू-ब्राह्मण समाज के लोग हैं, वहां अभी कृति को फैलाए रखते हैं।
जिस गांव में होगा भू-ब्राह्मण, वहां नहीं मिलते हैं क्षत्रीय
यह भी जानना जरूरी है कि पूरे भारत में जिस गांव में भूमिहार होगा, वहां क्षत्रीय नहीं होगा। दूसरे वर्ग के लोग रहते हैं। हां, यदि उस गांव में बाद में कोई बाशिंदा आकर बस गया हो तो नहीं कह सकते। ब्राह्मण वर्ग की एक शाखा के रूप में साथ-साथ चलने की कोशिश करने वाले भू-ब्राह्मण वर्ग के लोगों को हमेशा ब्राह्मण वर्ग के लोगों ने भी हमेशा तिरछी निगाह से ही देखी है।
विभिन्न समूह हैं भूमिहार वर्ग के
यदि भूमिहार समाज के विभिन्न प्रांतों के विभिन्न टाइटिलों और समूह पर बात करें तो महिहार, त्यागी, हव्यक, नियोगी, आयंगर, हेगडे, महिसुर बडफूकन, देसाई, त्यागी, जुझौतिया, क्षितिपावन, करहाडें, यवलकर, दाधिच, राजपुरोहित, बहुगुणा, पुष्करणा आदि विभिन्न समूह भूमिहार ब्राह्मण वर्ग के हैं। मारिशस में भी भूमिहार जाति के लोगों को धार्मिक भावनाओं को बचाने में सबसे बड़ा योगदान है।
चाणक्य, पुष्यमित्र जैसे पूर्वज हैं भूमिहार समाज से
इस संबंध में गया जिले के डा. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि भूमि अग्रहारण समाज के लोग मगध, काशी, सारण, मिथिला, झारखंड और बंगाल में बड़े राज्यों के कभी स्वामी थे। चाणक्य, पुष्यमित्र, आर्यभट्ट, बाण भट्ट के हम वंशज हैं। नेपाल से अयोध्या और श्रषिकेष के मठों के स्वामी भूमिहार समाज से लोग रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में भी किसान क्रांति के नायक स्वामी सहजानंद सरस्वती भूमिहार समाज से थे। मेडिकल, सेना और प्रशासन में अभी दबदबा कायम है। पटना में बड़े मेडिकल क्षेत्र में सबसे आगे हैं। रूरल एरिया में धीरे-धीरे वर्चस्व कायम है। बिहार में 25 धनाण्य व्यक्तियों में 23 इसी जाति के लोग हैं। बिहार में टेक्निकल क्षेत्र में यही बिरादरी के लोग वर्चस्व है।
वर्तमान में जागरूक हुआ है समाज
औरंगाबाद के रहने वाले और ईश्वर शरण डिग्री कालेज में अध्यापक भू-ब्राह्मण डा. विकास का कहना है कि वर्तमान में अपना समाज काफी जागरूक हुआ है। आपस का जुड़ाव भी बढ़ रहा है। यह जुड़ाव दूसरों के जुड़ाव को देखकर आ रहा है। यह भावना फैल रही है कि दूसरे वर्ग के लोग जब आपस में एकजुट हैं तो हम क्यों न मिलकर रहें। आने वाले समय में आपसी जागृति आने की पूरी संभावना है।
एकता का मतलब दूसरों से दुश्मनी करना नहीं
वहीं लखनऊ में भूमिहार समाज के नेता अजय राय का कहना है कि समाज में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन आज भी इसे बहुत बढ़ाने की जरूरत है। युवा पीढ़ी को इसके लिए आगे आना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हम दूसरों से दुश्मनी करते हैं। परिवार ही एक करने की क्षमता नहीं रखते तो फिर देश को एकता का मंत्र कैसे पढ़ा सकते हैं।
जागरूकता बढ़ी है पहले की अपेक्षा
वहीं आजमगढ़ के रहने वाले विरेन्द्र राय का कहना है कि हर वर्ग में जागरूकता आयी, जिसे देखकर भू-ब्राह्मण भी जागरूक हो रहे हैं, लेकिन इस जागरूकता से ज्यादा दूसरों में जलन बढ़ गयी है। हम हर एक के साथ व्यवहार में बदलाव भी नहीं करते, फिर लोग भू-ब्राह्मण को देखकर हमेशा जलन का भाव रखते हैं।
किसी जाति की एकता का मतलब, दूसरों के लिए खतरा नहीं होता
वहीं गाजीपुर जिले के दिल्ली में रहने वाले गोपाल राय का कहना है कि किसी जाति के एकता का मतलब दूसरी जाति के लिए खतरा नहीं होता है। सभी को आपसी मेल-जोल रखना जरूरी है। इससे ही पूरे भारत में एकता कायम रखा जा सकता है।







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बात बिल्कुल सही है—भूमिहार समाज का इतिहास गौरवशाली रहा है, चाहे वह ज्ञान परंपरा हो, भूमिदान व सुरक्षा की परम्परा हो या राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय भूमिका। लेकिन वर्तमान में राजनीति में पकड़ ढीली होना एक सच है, जिसका कारण संगठित नेतृत्व का अभाव, जातिगत विखंडन और बौद्धिक ऊर्जा का राजनीतिक दिशा में न लग पाना है। इतिहास की प्रतिष्ठा तभी सार्थक होगी जब वर्तमान में भी समाज अपनी रणनीति, नेतृत्व और संगठन क्षमता को मजबूत करे। इतिहास को गौरव समझना चाहिए, लेकिन वर्तमान को सुधारना ज़िम्मेदारी है।