Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Wednesday, February 18
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Current Issues

    यूजीसी के नए नियम : सामाजिक न्याय की मंशा और वर्ग संघर्ष का संवैधानिक संकट

    ShagunBy ShagunJanuary 29, 2026Updated:January 29, 2026 Current Issues No Comments4 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    UGC's new rules: The intention of social justice and the constitutional crisis of class struggle.
    यूजीसी के नए नियम : सामाजिक न्याय की मंशा और वर्ग संघर्ष का संवैधानिक संकट
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 723

    बृजेश सिंह तोमर

    (कानून यदि संतुलन खो दे, तो न्याय का औज़ार नहीं, विभाजन का कारण बन जाता है)

    यूजीसी के प्रस्तावित नए नियमों को लेकर उपजा असंतोष केवल किसी एक वर्ग की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस संवैधानिक चिंता की अभिव्यक्ति है, जो तब जन्म लेती है जब कोई मसौदा सामाजिक न्याय की आड़ में प्रक्रियात्मक असंतुलन पैदा करता है। यह बहस इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में सामाजिक ताने-बाने और वर्गीय संबंधों को प्रभावित करने वाला है।
    निस्संदेह, उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की घटनाएँ हुई हैं और उन्हें रोकना संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 21 के तहत राज्य का दायित्व है। परंतु संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी कानून केवल उद्देश्य की पवित्रता से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से वैध ठहरता है। यहीं यूजीसी के इस मसौदे की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है।

    इस मसौदे की पहली गंभीर त्रुटि है “अस्पष्ट और अतिव्यापक परिभाषाएँ”। “भेदभाव”, “उत्पीड़न” और “अनुचित व्यवहार” जैसे शब्दों को जिस तरह परिभाषित किया गया है, उसमें इरादे, परिस्थिति और अकादमिक विवेक के बीच स्पष्ट रेखा नहीं खींची गई। विधि का स्थापित सिद्धांत है कि अस्पष्ट कानून प्रशासन को विवेक नहीं, बल्कि मनमानी देता है। यह स्थिति सीधे-सीधे अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की आत्मा के विपरीत है।

    UGC's new rules: The intention of social justice and the constitutional crisis of class struggle.
    यूजीसी के नए नियम : सामाजिक न्याय की मंशा और वर्ग संघर्ष का संवैधानिक संकट

    दूसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण कमी है “झूठी एवं दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा का अभाव”। यह चिंता काल्पनिक नहीं है। देश पहले ही अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर लंबी कानूनी और सामाजिक बहस देख चुका है। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह स्वीकार किया है कि कानून का दुरुपयोग भी अन्याय का ही एक रूप है। इसके बावजूद, यूजीसी मसौदे में इस पहलू पर मौन चिंताजनक है। यदि मात्र आरोप से ही किसी शिक्षक, अधिकारी या छात्र को सामाजिक अपमान, प्रशासनिक कार्रवाई या मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़े, तो यह अनुच्छेद 21 में निहित गरिमा के साथ जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

    तीसरी बड़ी समस्या है”प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की कमजोर उपस्थिति”। Audi Alteram Partem अर्थात “दूसरे पक्ष को सुने बिना निर्णय न हो”,यह केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि न्याय की रीढ़ है। मसौदे में शिकायतकर्ता की सुरक्षा पर जोर है, परंतु आरोपी को निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध सुनवाई की स्पष्ट गारंटी नहीं दिखती। यह due process of law को असंतुलित करता है और कानून को सुधारक के बजाय भयकारी बना देता है।

    चौथा बिंदु, जो अक्सर बहस में दब जाता है, वह है सभी वर्गों के समान प्रतिनिधित्व का अभाव। Equal Opportunity Committees में कुछ वर्गों का उल्लेख तो है, किंतु सामान्य/अनारक्षित वर्ग के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। कानून यदि संरक्षण देता है, तो उसे समान सहभागिता और विश्वास भी देना चाहिए। प्रतिनिधित्व का यह असंतुलन सामाजिक संवाद को कमजोर करता है और नियमों को “एक-पक्षीय” होने की छवि देता है।

    पाँचवीं और दूरगामी चिंता है”अकादमिक स्वतंत्रता का क्षरण”। विश्वविद्यालय केवल प्रशासनिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि विचारों के केंद्र होते हैं। मूल्यांकन, अनुशासन, आलोचना और असहमति ये शिक्षा की आत्मा हैं। यदि हर अकादमिक निर्णय संभावित कानूनी जोखिम बन जाए, तो यह अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर chilling effect डालेगा। इसका परिणाम यह होगा कि शिक्षक और प्रशासक विवेक से नहीं, बल्कि भय से निर्णय लेंगे।

    छठा और अत्यंत संवेदनशील पहलू है”वर्गीय ध्रुवीकरण का खतरा”। कानून यदि संतुलित न हो, तो वह सामाजिक न्याय के बजाय वर्ग संघर्ष को जन्म देता है। पिछले कुछ वर्षों में समाज में बढ़ते मतभेद, अविश्वास और आक्रोश को देखते हुए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सरकार किस मंशा से ऐसे मसौदे ला रही है, जो संवाद के बजाय टकराव की भूमि तैयार करते हैं। सामाजिक न्याय का अर्थ किसी एक वर्ग को सशक्त करना नहीं, बल्कि समाज को समरस बनाना है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं अभिभाषक हैं)

    Shagun

    Keep Reading

    सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय: एआई का भारतीय मॉडल, आम आदमी के लिए अवसर

    युवाओं के लिए सावधानी का सबक है ‘विश्वास से पहले सतर्कता’

    Aam Aadmi Party took to the streets against the politics of hatred.

    नफरत की राजनीति के खिलाफ सड़कों पर उतरी आम आदमी पार्टी

    बदहाल नदियों से लोगों के पाप कब कब तक धुलेंगे?

    BNP's historic victory in Bangladesh: Return to power after 20 years, what does it mean for India?

    बांग्लादेश में BNP की ऐतिहासिक जीत: 20 साल बाद सत्ता में वापसी, भारत के लिए क्या मायने?

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर: सपा में शामिल होंगे नसीमुद्दीन सिद्दीकी

    Add A Comment
    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    Twin brothers from Bhubaneswar write a new chapter in JEE Main: Same hard work, same results!

    भुवनेश्वर के जुड़वां भाइयों ने JEE Main में लिखी नई इबारत: एक जैसी मेहनत, एक जैसा परिणाम!

    February 18, 2026
    'Garam Mahosh' is coming to set Bollywood on fire!

    बॉलीवुड में आग लगाने आ रहा है ‘गरम माहौल’!

    February 17, 2026

    उत्तर प्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं का महासंग्राम शुरू!

    February 17, 2026

    सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय: एआई का भारतीय मॉडल, आम आदमी के लिए अवसर

    February 17, 2026

    युवाओं के लिए सावधानी का सबक है ‘विश्वास से पहले सतर्कता’

    February 17, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading