लखनऊ, 03 मार्च। भारत में मन की बात होती है लेकिन किसानों की बात नहीं होती है। किसानों के दुखदर्द को कोई सुनने वाला नही है। हुक्मरान मन की बात तो खूब करते है लेकिन किसान की बातें करने में संकोच करते हैं। किसानों की समस्याओं के समाधान की बात नही होती है। किसान सत्तारूढ़ दल के किसी एजेंडे में शामिल नही दिखाई देता है। ये बाते आज अखिलेश यादव ने सपा की ओर से जारी एक प्रेस रिलीज़ के माध्यम से कही।
कर्जमाफी के नाम पर मजाक
उन्होंने कहा कि सच तो यह है कि जबसे भाजपा सत्ता में आई है किसान आर्थिक संकट में घिरता जा रहा है। किसान को फसल का लागत मूल्य भी नही मिल रहा है। भाजपा ने वादा किया था कि वह लागत मूल्य में 50 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर उसको फसल का लाभप्रद समर्थन मूल्य देगी। किसान की कर्जमाफी के नाम पर चंद रूपयों के लिए उसका मजाक उड़ाया गया। समाजवादी सरकार ने किसानों के लिए 75 प्रतिशत बजट रखा था और आपदा राहत के साथ मुफ्त सिंचाई सुविधा भी दी थी। भाजपा ने कृषि के बजाय पूजी घरानों के हित साधना शुरू कर दिया है।
प्रचार माध्यमों पर सत्तारूढ़ दल के प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किसान की समस्याओं पर टीवी पर कोई जिक्र नहीं होता है। उसकी दुर्दशा पर चर्चा नहीं होती। लेकिन इससे यह अर्थ निकालना कि किसान खुशहाल है बेमानी होगा। गरीबी-बेकारी पर टीवी पर चर्चा न हो तो यह मान लेना क्या सही होगा कि अब देश में गरीबी-बेकारी समाप्त हो गई है?
समाजवादी चाहते है कि देश में विचार और विकास की राजनीति होनी चाहिए। भाजपा बात तो विकास की करती है लेकिन जातिवाद और साम्प्रदायिकता की संकीर्ण राजनीति अपनाए रहती है। इस सच्चाई पर चर्चा होना आवश्यक है।







