संयुक्त राष्ट्रसंघ में पाक की फजीयत

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कश्मीर के विशेष दर्जे के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में मुंह की खाए पाकिस्तान ने अब नया पैंतरा बदला है वह अब भारत में लगातार युद्ध विराम का उलंघन कर रहा है जिसका भारत ने कड़ा जवाब दिया है।

बता दें कि संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर पर भारत के फैसले पर अनौपचारिक चर्चा कराने में चीन की सफलता सामान्य तौर पर हमारे लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए, पर इसके मायने गंभीर हैं। इसका स्वरूप बंद कमरे में बातचीत का होगा, जिसको औपचारिक बैठक नहीं कहा जा सकता है। न इसका कोई रिकॉर्ड होगा, न इसमें मीडिया का प्रवेश होगा न यह सार्वजनिक किया जाएगा कि किसने क्या कहा? पाकिस्तान ने इसमें अपनी बात रखने की इजाजत मांगी थी और चीन ने भी इसका समर्थन किया था, पर उसे इसकी इजाजत नहीं मिली।

पाकिस्तान इसे अपनी बड़ी राजनयिक विजय के तौर पर प्रचारित कर रहा है। हालांकि उसने सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को पत्र लिखकर आपात बैठक की मांग की थी जिसे नहीं माना गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष ने भी पत्र को महत्त्व नहीं दिया। इसके पूर्व कश्मीर पर सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक 1971 में हुई थी, जिसका भारत की नीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इस बार भी यही होना है।

वैसे भी भारत के कूटनीतिक प्रयासों से दो स्थायी सदस्य रूस और फ्रांस इसका विरोध करने वाले हैं। हो सकता है ब्रिटेन भी इसके लिए तैयार हो जाए। बावजूद इसके मायने गंभीर इसलिए है कि पाकिस्तान को इस मामले में चीन का साथ मिल गया है। वस्तुत: पाक अधिकृत कश्मीर में चीन का भी बहुत कुछ दांव पर लगा है। पाकिस्तान द्वारा दिए गए भूभाग पर उसका पूर्ण नियंत्रण है, जो उसके लिए सामरिक महत्त्व का है। उसे वह कतई छोड़ना नहीं चाहेगा। दूसरे, गिलगित पाकिस्तान सहित पाक अधिकृत कश्मीर में चीन पाक आर्थिक गलियारा में काफी निवेश कर चुका है। तो उसका अपना स्वार्थ इसमें निहित है।

बता दें कि चीन भी एक सीमा तक पाकिस्तान के साथ रहेगा। हम चीन की चुनौती को कभी छोटा कर नहीं आंक सकते। विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा चीन यात्रा के दौरान यह कहने के बावजूद कि इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कोई अंतर नहीं पड़ा है और संवेदनशील मुद्दों में संवेदशीलता पर ही द्विपक्षीय संबंध निर्भर करेगा चीन ने यह पहल की है। भारत को इस चुनौती का आगे भी सामना करना होगा। भारत की कूटनीति इसके लिए निस्संदेह तैयार होगी।

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