भारत बंद कानून व्यवस्था के लिए देखते ही देखते चुनौती साबित हो गया
भारत बंद के दौरान अनेक जगहों में हिंसा, आगजनी, तोडफोड़ के साथ ही साथ गोली चलने की भी घटनाएं घटित हुईं। हिंसा के दौरान कुछ लोगों की मौत हो जाने के समाचार प्राप्त हुए हैं। इसी दौरान सरकारी व निजी संपत्तियों को नुक्सान भी पहुंचाया गया। बंद का खासा असर देश के अनेक हिस्सों में देखने को मिला, जहां स्कूल-कॉलेज समेत बाजार बंद रहे तो वहीं स्वास्थ्य एवं यातायात जैसी अहम सेवाएं भी ठप हो गईं। हालात बेकाबू होते देख अनेक शहरों में कर्फ्यू जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने अजा/जजा अत्याचार रोकथाम अधिनियम को शिथिल करने वाला फैसला क्या सुनाया सोए हुए दलित मानों नींद से जाग गए।
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए संभवत: यह नहीं सोचा होगा कि उसके इस फैसले का असर संपूर्ण देश में इस कदर होगा। उसे तो भान भी नहीं हुआ होगा कि ऐसा करने से देशभर में कोहराम मच जाएगा। कोर्ट ने तो इसके दुरुपयोग की बात स्वीकारते हुए उन लोगों को राहत देने का विचार किया होगा जो पीड़ित और परेशान थे। जहां तक कानून व्यवस्था की बात है तो स्पष्ट है कि राज्य सरकारों को पहले से इसके लिए तैयार रहना चाहिए था, क्योंकि यह सभी जान रहे थे कि इस फैसले के बाद दलितों का गुस्सा फूटेगा और तब उन्हें संभालना आसान नहीं होगा।
फैसले के असर की अनदेखी के चलते ही देश में आज ये हालात बने और कानून व्यवस्था बनाए रखने में राज्य सरकारें फेल साबित हो गईं। जहां तक कोर्ट के फैसले का सवाल है तो यदि वह सही नहीं लग रहा था तो उसके खिलाफ भी अपील की जा सकती थी और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात तथ्यों और तर्कों के माध्यम से रखी जानी चाहिए थी।
जहां तक एससी/एसटी एक्ट का सवाल है तो यह सच है कि इस एक्ट के तहत मामले जो दर्ज किए जाते रहे हैं उनमें से कुछ मामले ऐसे भी सामने आए हैं जो कि दबाव बनाने या फिर आपसी रंजिश के चलते, दुर्भावनावश दर्ज कराए गए। राजनीतिक दबाव बनाने के लिए भी इसका दुरुपयोग बहुतायत में होता हुआ दिखाई दिया। यही वजह है कि समय-समय पर एससी/एसटी एक्ट को खत्म करने की मांग भी उठीं, ठीक वैसे ही जैसे कि इस समय संपूर्ण देश में आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जातिगत आरक्षण को खत्म कर आर्थिक आरक्षण लागू किया जाए। इससे सभी वर्ग व जाति के गरीब लोगों को लाभ मिल सकेगा। आरक्षण के हिमायती इसके पक्ष में नहीं हैं, उनकी दलील है कि आरक्षण आर्थिक मदद का नाम नहीं है बल्कि समाज में बराबरी का दर्जा दिलवाने की प्रक्रिया है और जब तक सभी वर्ग समानता वाले धरातल पर नहीं आ जाते तब-तक आरक्षण मिलते रहना चाहिए।
ठीक इसी तरह से एससी/एसटी एक्ट के हिमायतियों का कहना है कि इसके शिथिल या कमजोर होने का दुरुपयोग उंची जाति के लोग, बाहुबली कहे जाने वाले और क्षेत्रीय दबंग खुलकर करेंगे, क्योंकि उन्हें भय ही नहीं होगा कि मामला दर्ज होते ही उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। उन्हें कानून का भय इसी स्तर पर आकर होता है कि उनकी सुनवाई नहीं होगी ओर जेल में रहना पड़ेगा। बावजूद इसके संगीन से संगीन अपराध करने के बाद उनकी कोशिश होती है कि पीड़ित को पुलिस थाने रिपोर्ट दर्ज करवाने जाने ही न दें।
इसके लिए साम-दाम-दंडभेद की नीति अपनाई जाती है, लेकिन फिर भी भय तो रहता ही है, कि अगर रिपोर्ट लिख गई तो सीधे जेल ही जाना पड़ेगा। अत: एक दमदार एक्ट को कमजोर करना दलितों पर अत्याचार करने की खुली छूट देने के बराबर ही कहा जा सकता है। यही वह सोच है जिसके चलते अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम को कथिततौर पर कमजोर करने के विरोध में 2 अप्रैल को भारत बंद का आव्हान किया गया। इसके जरिए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का विरोध किया गया जिसमें कहा गया था कि बिना जांच-पड़ताल के एससी/एसटी एक्ट के तहत न तो मुकदमा ही दर्ज किया जाए और न ही गिरफ्तारी ही की जाए।
इस फैसले के विरोध में दलित संगठन जिस रुप में सामने आए हैं वो उनकी पीड़ा और नाराजगी को दर्शाता है, लेकिन इस बीच देश के अनेक हिस्सों में जो हिंसा की वारदातें हुईं वो भी सही नहीं ठहराई जा सकती हैं। इसके लिए कहीं न कहीं राजनीतिक हस्तक्षेप ही जिम्मेदार है, क्योंकि कोर्ट के फैसले के विरोध में लोगों को आंदोलन के लिए तैयार करना और उन्हें लेकर सड़कों पर उतर आना कहां तक जायज ठहराया जा सकता है। यहां यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि जिस तेजी से नेतृत्वविहीन भीड़ द्वारा हिंसा की वारदातें देश में हुई हैं, इससे उनके और भी बढ़ने की आशंका पनपती है। चूंकि भारत बंद को अनेक संगठनों का समर्थन हासिल रहा है, इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों को इसे गंभीरता से लेना चाहिए था और आंदोलन की बजाय बीच का रास्ता निकालने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए थे, लेकिन इसमें सभी बुरी तरह फेल साबित हुए। हमारी शुतरमुर्ग सरकारें समस्या का हल खोजने की बजाय तूफान के निकल जाने तक चादर ओढ़कर सोती रहीं और भारत बंद कानून व्यवस्था के लिए देखते ही देखते चुनौती साबित हो गया।







