जीके चक्रवर्ती

कोयला घोटाले में मधु कोड़ा को सीबीआइ की विशेष अदालत ने जो सजा सुनाई है उससे क्या भ्रस्टाचारी कोई सबक ले पाएंगे ये तो वही जाने लेकिन इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए क्योकि इस फैसले से कोयले घोटाले में लिप्त कई भ्रस्टाचारियों के हाथ जले।
सत्ता में रहते हुए पद के दुरुपयोग एवं भ्रष्टाचार के आरोप राजनीतिकों पर अक्सर लगते रहे हैं। यूपीए सरकार के सत्ता में मौजूदगी के दौरान हुये कोयला घोटाला देश भर में चर्चा का विषय बना रहा। लेकिन कर्नाटक में भाजपा के राज में बेल्लारी लूट एवं रेड्डी बंधुओं के भ्रष्टाचारों ने बदनामी में रिकार्ड बनाए। इस घोटाले की शुरुआत साल 2006 में कोयला खदानों के आवंटन के लिए केंद्रीय कोयला मंत्रालय द्वारा आवेदन मांगने से शुरू हुई थी।
विशेष प्रायोजनो के लिए 38 खदानों का आवंटन हुए थे जिनमें से 15 खदानों को बिजली-उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए देना तय किया गया था, एव 23 गैर-ऊर्जा क्षेत्र के जरूरतों के लिए। लेकिन मार्च 2012 में नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट के अनुसार आबंटन की समस्त प्रक्रिया पर सवाल उठ खड़े हुए। इस रिपोर्ट के अनुसार आवंटन हासिल करने वालों को अप्रत्याशित रूप से लाभ पहुंचाया गया, नियम-कायदों तक के परवाह किये बिना उनको ब्लॉग आवंटन कर दिए गए। इस रिपोर्ट के कारण सियासी उबाल आना स्वाभाविक ही था। उस समय केंद्र की यूपीए सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई थी, वही पर भाजपा के दो सांसदों की शिकायत को लेकर इसे केंद्रीय सतर्कता आयोग को वर्ष 2005-09 के दौरान हुए आवंटनों की जाँच का काम सौंप दिया गया।
लेकिन इस मामले को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां जारी रही। जिसके कारण यूपीए सरकार से पूर्व किये गए आवंटनों पर भी सवाल उठाये गए इसके ठीक दो वर्षों के बाद, एक जनहित याचिका दायर हुई जिसके सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 1993 से आवंटित 218 खदानों में से 214 के आवंटनों को रद्द कर दिया। मनमाने ढंग से इन कोयला खदानों को मनमाने तरीकों से निजी कंपनियों को आबंटित कर देने के मामले पर राजनीतिकों के साथ कुछ एक नौकरशाहों झारखण्ड के ही नहीं वल्कि कुछ एक अन्य राज्ययों के लोगों के जुड़े होने का मामला सामने आने से केवल झारखण्ड ही नहीं ओड़िशा एवं गोवा जैसे राज्यों के मामलों की जांच न्यायमूर्ति शाह आयोग के द्वारा जब की गई तो उसमे भी बड़े पैमाने पर अनियमितता पाई गई थी अब यहाँ पर ऐसा प्रश्न उठना लाजमी है कि क्या उन मामलों में भी अदालती फैसला आ पायेगा जैसा कि 13 दिसम्बर दिन बुधवार को सीबीआइ की विशेष अदालत ने फैसले में मधु कोड़ा को 3 साल की जेल और 25 लाख का जुर्माना लगाया है यह सजा घोटालेबाजो के लिए एक नज़ीर के रूप में पेश की जाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)







