लीला भंसाली को ‘हत्याओं’ की लत

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श्याम कुमार

फिल्म-जगत के इतिहास में लीला भंसाली एक बेजोड़ चरित्र बन गए हैं। उन्होंने विवादास्पद होने का कीर्तिमान बना लिया है। ‘पद्मावती’ नाम की फिल्म बनाकर उन्होंने देशभर में जो तूफान खड़ा किया, वह पहले नहीं देखने को मिला था। अधिकांश लोगों का मत है कि लीला भंसाली ने जानबूझकर फसाद खड़ा किया। माना जाता है कि प्रायः जो फिल्म विवादित होती है, जिज्ञासावश उसे देखने के लिए दर्शक उमड़ पड़ते हैं और फिल्म हिट हो जाती है। पुराने समय में फिल्मों के बारे में विवाद की घटनाएं शायद ही हुआ करती थीं।

कई दशकों पहले जब फिल्मी गानों के रिकार्डों का प्रचलन था, उस समय ग्रामोफोन कम्पनी ‘हिज मास्टर्स वाॅयस’ हुआ करती थी। उसके रिकार्डों पर एक कुत्ते का चित्र बना होता था। ‘मुगलेआजम’ फिल्म में लता मंगेशकर का गाया हुआ एक बहुत उत्कृष्ट नातिया गीत था- जिसके बोल थे ‘बेकस पे करम कीजिए सरकारे-मदीना’। नातिया गीत के सम्मान स्वरूप उस रिकार्ड पर कुत्ते का चित्र नहीं मुद्रित किया गया था।

अब तो बात-बात में विवाद उत्पन्न होना आम बात हो गई है। नया उदाहरण अभिनेत्री प्रिया प्रकाश की मलयालम फिल्म ‘ओरू अदार लब’ है, जिसके किसी गाने पर मुसलिमों की ओर से आपत्ति उठाई गई है। वैसे, कुछ फिल्म-निर्माता जानबूझकर जनमानस को भड़काने का भी काम कर रहे हैं। दुर्गा हिन्दुओं की आराध्य देवी हैं, किन्तु उनके नाम पर फिल्म का नाम ‘सेक्सी दुर्गा’ रख दिया गया। आमिर खान की एक पिक्चर में तो शंकर भगवान को अत्यन्त मसखरे के रूप में चित्रित किया गया। पत्रकारिता के जनक देवर्शि नारद को फिल्मों में हमेशा विदूशक के रूप में दिखाया गया है। हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करने वाले तमाम दृष्य फिल्मों में दिखाए जाते रहे हैं, किन्तु उन पर छिटपुट विरोध ही हुआ। ‘पद्मावती’ फिल्म ने ऐसा बवंडर उत्पन्न किया, जिससे विरोध का कीर्तिमान स्थापित हो गया।

विवाद खड़ा करने में लीला भंसाली को माहिर माना जाने लगा है। महान कथाकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अनेक कालजयी उपन्यासों की रचना की, जिनमें एक अत्यन्त प्रसिद्ध उपन्यास देवदास है। ‘देवदास’ उपन्यास शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के अन्य महान उपन्यासों की तरह जब हिन्दी में अनूदित हुआ तो उसकी धूम मच गई। लेकिन उस उपन्यास को अद्भुत फिल्म-रचना का रूप दिया भारतीय फिल्म जगत के महानतम फिल्म-निर्देशक विमल राय ने। वैसे तो ‘देवदास’ उपन्यास पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी थीं। एक फिल्म में सुप्रसिद्ध कलाकार सहगल नायक थे और वह फिल्म अपने समय में बहुत लोकप्रिय हुई थी। लेकिन विमल राय ने जिस ‘देवदास’ फिल्म का निर्माण किया, वह हर दृष्टि से लाजवाब थी। विमल राय-जैसा योग्य एवं महान फिल्म-निर्देशक भारतीय फिल्म-जगत में कोई दूसरा नहीं हुआ। उनकी ‘देवदास’ फिल्म का स्थान भी बेजोड़ माना जाता है।

उच्चतम कोटि के निर्देशन के अलावा इस फिल्म में सभी कलाकारों के अभिनय एवं गीत-संगीत का भी कोई सानी नहीं था। लीला भंसाली ने भी कुछ वर्श पूर्व ‘देवदास’ फिल्म का निर्माण किया और उन्होंने उस फिल्म में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की महान कृति ‘देवदास’ की जमकर हत्या की। कहानी को ऐसे-ऐसे विचित्र रूप दे दिए गए, जिनसे ‘अर्थ का अनर्थ’ बन गया। यहां तक कि कल्पना की फूहड़ उड़ान भरते हुए पारो एवं चन्द्रमुखी का युगल नृत्य दिखा दिया गया।

लीला भंसाली का एक सटीक फारमूला है। वह किसी भी वास्तविक कहानी को तोड़मरोड़कर इतने भव्य रूप में फिल्मांकन करते हैं कि दर्शकों का ध्यान उनकी बदनीयती की ओर न जाकर फिल्म की भव्यता में उलझकर रह जाता है और वह फिल्म हिट हो जाती है। भारतीय फिल्म-जगत में भव्यता के मामले में सबसे बड़ा नाम करीम आसिफ का माना जाता है। उन्होंने ‘मुगलेआजम’ फिल्म का जिस भव्यता से निर्माण किया, उसने उन्हें अमर कर दिया। यहां तक कि करीम आसिफ ने ‘मुगलेआजम’ में जहां-जहां असली रत्नों की दरकार हुई, वहां असली रत्न ही इस्तेमाल किए, नकली नहीं। लीला भंसाली ने जब महान ऐतिहासिक चरित्र पद्मावती पर फिल्म का निर्माण किया तो उन्हें विश्वास था कि वह भव्यता के अपने फूहड़ फारमूले पर अमल कर सफलता की बाजी मार ले जाएंगे। लीला भंसाली सोच रहे थे कि ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर जो विवाद खड़ा होगा, उससे उन्हें फिल्म की बिक्री व लोकप्रियता में बहुत फायदा हो जाएगा। यही कारण है कि जब ‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ कि उसमें लीला भंसाली ने अनर्थ करते हुए अलाउद्दीन खिलजी व पद्मावती को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में दिखा दिया है तो लीला भंसाली ने उस विवाद को तत्काल शांत करने के बजाय गोलमोल बातें कर विवाद को और हवा दे दी।

सुविख्यात विचारक अजय मित्तल ने एक जगह लिखा हैः-‘बाजीराव मस्तानी’ फिल्म में जिस प्रकार भंसाली ने पेशवा बाजीराव प्रथम का चरित्र-हनन करते हुए इतिहास से खिलवाड़ किया था, उसका उसी समय अगर विरोध हो गया होता तो शायद ‘पदमावत’ फिल्म में वैसी शरारत की कोशिश वह न करते। एक ऐसा योद्धा-सेनापति, जो अपने सभी 42 युद्धों में अपराजित रहा, ब्रिटिश फील्ड मार्शल मोंटगोमरी ने जिसे विश्व के सर्वश्रेश्ठ घुड़सवार सेनापतियों में शुमार किया, उसे मुख्य रूप से एक आशिक, एक मजनू बनाकर प्रदर्षित करना क्या सत्य की हत्या नहीं? याद रहे, केवल 19 वर्श की उम्र से बाजीराव ने अपना विजय-अभियान शुरू किया था।

मोंटमोमरी ने दूसरे महायुद्ध में हिटलर की फौज पर मिस्र में जो पहली जीत 1942 में दर्ज की, उसकी रणनीति उन्होंने बाजीराव की पालखेड-विजय (1728) से पाई थी। पालखेड को उन्होंने ‘रणनीतिक गतिषीलता का कमाल’ (मास्टरपीस आॅफ स्ट्रेटेजिक मोबिलिटी) बताया है। 1738 में दिल्ली पर कब्जा कर बाजीराव ने मुगल सुलतान मुहम्मद शाह रंगीला को प्रतिवर्ष पचास लाख होंण (स्वर्ण सिक्के) पुणे (पेशवा की गद्दी) भेजने की शर्त पर जीवित छोड़ा था। इसके बाद दिल्ली में मराठा सेना का एक दस्ता तैनात रहा है।

इस अद्वितीय रण-विजेता को भंसाली ने महज एक इश्कबाज बना डाला। जब इस पर विरोध के स्वर नहीं उठे तो उन्होंने जौहरव्रत वाली वीरांगना पद्मावती के चरित्र से खिलवाड़ का साहस जुटा लिया। उन्होंने विवाद के आरम्भ में इस बात से इनकार किया था कि रानी और अलाउद्दीन खिलजी के बीच किसी प्रेम-प्रसंग का कोई चित्रण फिल्म में है। फिर स्पश्टीकरण दिया कि वह एक स्वप्न-दृश्य है। लोग इस बात से भड़के। लगता है, भंसाली स्वयं विवाद पैदा करना चाहते थे, ताकि उसका फायदा फिल्म को मिले। किन्तु बात षायद उनके नियंत्रण से बाहर चली गई।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है