अब वह समय आ गया है कि देश में भी एक समान समाजिक व्यवस्था का स्थापित होना अत्यंत आवश्यक है
जी के चक्रवर्ती
आज देश को आजाद हुए 70 दशकों से अधिक का समय व्यतीत हो चुका है और डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर की मृत्यु हुए 6 दिसम्बर 1956 से आज वर्त्तमान समय तक 62 वर्ष गुजर जाने के बाद भी भारत में फैले जातियता के उन्मूलन करने का उनका सपना वर्त्तमान समय तक डॉक्टर अंबेडकर के पदचिन्हों पर चलने वाले अंबेडकरवादी लोग पूरी तरह सजग रहते हुए लोगों के अंतस मन में इसके लिए अलख जगाए रखना और हमेशा अपने ही जाति के लोगों के पक्ष में मजबूती से खड़े अवश्य दिखाई देते हैं। साथ ही साथ यह लोग जातिवाद को कोसते हुए अपने जाति के लोगों के लिए त्याग एवं वलिदान करने के लिए हमेशा तत्यपर रहते है।
आज वर्त्तमान समय में डॉ. अंबेडकर के राष्ट्र निर्माण एवं मानवतावादी जैसे विचार धाराओं को वर्त्तमान समय तक जिन्दा रखने में पुरजोर कोशिश करते रहे स्वमं दलितों ने ही उन्हें आरक्षण के मसीहा के रूप में समाज में स्थापित कर देश के कोने कोने तक उनके नाम से विश्वविध्यालय से लेकर अनेको सामाजिक संस्थाएं खुलवाकर उनके राष्ट्र निर्माण जैसे सामाजिक विचार धारा को समाज में वर्त्तमान समय तक कायम रखने का काम किया है। जगह -जगह पर उनके मूर्ति स्थापित कर उनके नाम को रोशन करने जैसे कार्यों के अलावा उनकी छवि को समाज में चिर स्थापित करने जैसा काम किया है। हमारे देश में जातियों का प्रदुर्भाव धार्मिक विश्वास, प्रतीक सामाजिक और धार्मिक प्रथाएँ एवं व्यवहार, खानपान के नियम, जातीय अनुशासन और सजातीय विवाह इन जातीय समूहों की आंतरिक एकता को स्थिर तथा दृढ़ करने के लिए एक व्यवस्था के रूप में कायम किया गया। लेकिन इसकी शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई इसकी कोई सटीक जानकारी नहीं है।
वही पर संपूर्ण दुनिया में अमीरी एवं गरीबी के आधार पर वहां के मनुष्यों द्वारा समाज के लोगों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया ऐसी व्यवस्था मानव सभ्यता में बहुत पूर्व काल से मौजूद रही है वल्कि इसमें समय समय पर अनेको बदलाव होते रहे हैं। हमारे देश में वर्ण एवं जाति व्यवस्था की परिपाटी समाजिक व्यवस्था की संरचना है, इसे दैवीय शक्ति द्वारा स्थापित मानना हम इंसानो द्वारा ही समाज में फैलाई गई अन्धविश्वास के रूप में प्रचारित हुई समय के अनुसार हुए परिवर्तनशीलता के नियमो के अनुसार समय समय पर लोगों के विचार एवं परस्पर एक दूसरे के टकराहटो एवं साथ न देने के कारण समाज में फैली ऐसी कुप्रथाओं से लड़ने और समाज से इसे हमेशा हमेशा के लिए इसे ख़त्म करने के लिए अभी और कुछ समय तक इंतेजार करना पड़ेगा वहीं पर दुनिया के अस्सी प्रतिशत हिस्से में फैले रंग एवं नस्लभेद जैसी सामाजिक कुप्रथाएं समाप्त हो चुकी हैं, लेकिन वर्त्तमान समय तक हमारे देश भारत में जातिवाद जैसी सामाजिक कुप्रथा आज भी हमारे समाज में जिन्दा है लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि समाज में समय के साथ साथ बहुत बडे बदलाव आने से ऐसी प्रथाओं में कमी अवश्य हुई हैं वाही पर आज दुनिया में अनेको जगह पर से इस तरह के कुप्रथाएं बिलकुल समाप्त हो चुकी है लेकिन अब वह समय आ गया है कि देश में भी एक समान समाजिक व्यवस्था का स्थापित होना अत्यंत आवश्यक है, हमारे देश में जातिवादी व्यवस्था को ही हमारा समाज मान लेने से जातिवादी व्यवस्था में एकसामान ‘भारतीय समाज’ की परिकल्पना करने जैसी बातें बेमानी होगी। जाति हमारे समाज के नागरिकता पर भारी पड़ने से एक प्रथम दर्जे और दोयम दर्जे की नागरिकता को परिभाषित करती है।
जाति का जनक मनुवाद और ब्राह्मणवाद को माना जाता है। जाति में ऊंच-नीच है। असमानता है। शोषण और अत्याचार है। इसलिए समाज के सभी बुद्धिजीवी वर्गों के लोगों को समाज में फैले इस जातिवादी व्यवस्था से पीड़ित दलित लोगों की सुरक्षा एवं समाज में उनको बराबरी का हक़ एवं सम्मान दिलाने जैसे प्रयास करना पड़ेगा जिससे की वे अधिकारी है और देश में परस्पर समानता और भाईचारा बने रहने से समतामूलक समाज के निर्माण के लिए यह उचित भी होगा। हमारे समाज के कुछ दलित जातियां अपने आपको उनसे श्रेष्ठ और उनसे महान जैसे बता कर आपस में ही टकराने जैसे कार्य कर रहे हैं। अंबेडकरवादी लोगों को अपने ही जाति में फैले जाति क्रम, वर्ण व्यवस्था की तर्ज को न स्वीकारते हुए दलितों ‘स्वयं अपने ही अंदर फैले ऐसी कुरीतियों को शक्ति के साथ रोकना होगा। यह सत्य है कि मनुवाद एवं ब्राहमणवाद समाज के लिए अति हानिकारक है। आज देश को आजाद हुए 70 वर्षों के बाद भी दलितों के मैला ढोने जैसे काम लिए जाने से ऐसे अमानवीय कार्य करने के लिए मजबूर हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर की शिक्षाओं में अन्याय एवं अत्याचार के खिलाफ प्रतिकार के रूप में उठ खड़े होने की बातें है, लेकिन सामाजिक घृणा और अलगाव नहीं है।
समाज में समता और समानता की बात अवश्य होते रहना चाहिए और आरक्षण को प्रोत्साहन एवं प्रतिनिधित्व प्रदान करने वालों को आगे आना चाहिए इन सबो के अलावा उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रोत्साहन और प्रतिनिधित्व सभी दलित जातियों को समान रूप से मिले। वर्तमान समय में देश के अगड़ी जातियां पिछड़ी जातियों को साथ लेकर गम-खुशी तथा खान-पान में एक साथ एकत्रित होती रहती हैं वही पर अब यह भी देखने को मिल रहे हैं कि कुछ दलित जाति के लोग जो ऊंचे स्तर तक पहुँच चुके है उन्हें अन्य लोगों के विवाह पार्टियों या धार्मिक अनुष्ठानों में एक साथ उपस्थित रह कर उनके साथ सम्मिलित रहते हैं।
इस तरह से हमें मौजूदा समय में यह देखने को मिला है कि पुरानी रूढ़ियाँ टूटती हुई दिखाई दे रही है लेकिन ऐसा हमेशा देखने को नहीं मिलता है। वहीं पर यदि हम बात करें आरक्षण-संपन्न उन दलित जातियों की तो हमें यही कहना पड़ता है कि आज वर्तमान समय में भी उन सफाई पेशा से जुड़े जातियों के लोगो के साथ सवर्ण जातियों के लोगों द्वारा अपृश्यता का व्यवहार का किया जाना आज भी बदस्तूर जारी है एवं जाति के नाम पर एसे लोगों का शोषण भी करने से नहीं चूकते है।
आज देश में सफाई पेशा से जुड़े जातियां सवर्णो और अवर्णो सबके लिए अछूत हैं। सवर्णो द्वारा किए जाने वाले शोषण एवं अत्याचार के विरुद्ध अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानून बने है, किन्तु इन दलित के मनुवादियों द्वारा शोषण एवं अत्याचार के विरुद्ध भी अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानूनों को प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि इन्हें भी समाज में न्याय और सम्मान मिल सके। दलितों में परस्पर समानता के भाव को और भी मजबूत किये जाने की जरुरत है अन्यथा बहुजन हिताय बहुजन सुखए जैसे नारे अर्थहीन हो जाएंगे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







