नमामि गंगे’ परियोजना के बाद भी आखिर गंगा मैली क्यों?

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जी के चक्रवर्ती

वर्ष 2014 नवम्बर के महीने में उमा भारती ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में हुए एक बहुत बड़े जनसभा में यह कहा था कि कि ‘गंगा सफाई के काम अगले तीन वर्षों में जमीनी स्तर पर दिखाई देना शुरु हो जायेंगे। वहीं पर केवल दो ही महीने से भी कम समय में ही यह योजनाएं बंदी के कगार पर पहुँच गई और इस योजना के पूरे चार वर्षों से अधिक के समय गुजरने के बाद भी इस योजना के काम का असर जमीन स्तर पर दिखाई नहीं दिया और न ही कुछ गंगा सफाई को लेकर कुछ काम होता हुआ नजर नहीं आया। दरअसल उस वक्त गंगा की सफाई के लिए बनाई गई इस योजना को एक बहुत बडे महत्वाकांक्षा को साथ लेकर शुरु किया गया था। इस तरह के आश्चर्य चकित करने ‘नमामि गंगे’ परियोजना के ऑडिट करने वाले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट से आश्चर्य चकित करने वाले खुलासे सामने आये कि वर्ष 2014-17 तक के मध्य गुजरे इन तीन वर्षो के दौरान इस योजना के लिए आम बजट में आवंटित हुए धनराशि का मात्र 8 से 63 प्रतिशत धनराशि ही खर्च हो पाई एवं बड़ी राशि केंद्र अवं राज्यों के राष्ट्रिय स्वच्छ गंगा मिशन (एसपीएमजी ) जैसी एजेंसियों के पास पड़ी हुई है।

‘नमामि गंगे’ योजना में गौमुख गंगोत्री से प्रारम्भ कर बंगाल तक गंगा के किनारे घाटों एवं गंदे नालों के पानी से प्रदुषित होती गंगा की स्वच्छता पर ध्यान दिया जाएगा। गंगा सफाई को लेकर इस बीच कई मीटिंगों और योजनाओं पर काम करने की बात जरूर होती रही है लेकिन कही पर भी कोई भी ठोस कार्य धरातल पर नहीं किये गए।


वाराणसी एवं हरिद्वार जैसे राज्यों से एक साथ प्रारम्भ हुई नमामि गंगे मिशन की 231परियोजनाओं की हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबद , बनारस , गाजीपुर , बलिया , बिहार में 4 और बंगाल में 6 जगहों पर पुराने घाटों का जीर्णोद्धार, नए घाट, चेंजिंग रूम, शौचालय, बैठने की जगह, सीवेज ट्रीटमेंट प्लान्ट, आक्सीडेशन प्लान्ट बायोरेमेडेशन प्रक्रिया से पानी के शोधन का काम किये जाने के लिए हरिद्वार में जहां उमा भारती और नितिन गडकरी ने इस योजना की शुरुआत की तो वहीं पर वाराणसी में रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा द्वारा इस योजना की शुरुआत की गई। ‘नमामि गंगे’ योजना में गौमुख गंगोत्री से प्रारम्भ कर बंगाल तक गंगा के किनारे घाटों एवं गंदे नालों के पानी से प्रदुषित होती गंगा की स्वच्छता पर ध्यान दिया जाएगा। गंगा सफाई को लेकर इस बीच कई मीटिंगों और योजनाओं पर काम करने की बात जरूर होती रही है लेकिन कही पर भी कोई भी ठोस कार्य धरातल पर नहीं किये गए।

इसके प्रोजेक्ट डायरेक्टर का कहना हैं कि ” गंगा एक्शन प्लान का ध्यान सफाई पर केंद्रित था। जिसमे कोई बुराई तो नहीं थी लेकिन उसमे अविरलता की बात तो कह रहे हैं लेकिन उसकी कोई योजना नहीं बता पाते है केवल गंगा के किनारे उसके सौंदर्य की ही बात कह पाए। गंगा में प्रति वर्ष 3000 मिलियन लीटर सीवेज प्रति दिन डालते हैं, जिसमें बनारस में 300 मिलियन लीटर सीवेज डाला जाता है। जैसा की आज भी वर्त्तमान समय में लगातार उसी प्रकार डाला जा रहा है। गंगा में डाले जाने वाले सीवेज में हम सिर्फ 1000 मिलियन लीटर प्रतिदिन का ही ट्रीटमेंट कर पाते है बाकि के 2000 मिलियन लीटर सीवेज एसे ही बहा चला जा रहा है जिसकी वजह से गंगा में स्वछ गंगा का जल ही नहीं बचा है। इन्ही कारणों से कुछ जानकारी रखने वालों का कहना हैं कि सर्वप्रथम गंगा को बचाया जाना चाहिए उसके बाद उसकी सुंदरता को देखा जाना चाहिए।

नेशनल मिशन क्लीन गंगा के विशेषज्ञ प्रो बीडी त्रिपाठी का स्पष्ट कहना हैं कि “गंगा की जो अनुदैर्ध्य संयोजकता खत्म होती जा रही है जिसके कारण गंगा, नदी नरह कर तालाब का रूप धारण करती जा रही है। वर्त्तमान समय में गंगा में थोडी सी भी गंदगी पड़ने से ही उसमे प्रदूषण का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है ऐसी अवस्था में गंगा में गंदे पानी के छोड़ने की कौन सी योजना है उसे प्राथमिकता के आधार तात्कालिक शुरू करना पड़ेगा।

जबकि यह ध्यान रखने वाली बात है कि गंगा की लम्बाई 2525 किलोमीटर की है। गंगा का बेसिन 1. 6 मिलियन वर्ग किलोमीटर का है एवं 468. 7 बिलियन मीट्रिक पानी एक वर्ष भर में प्रवाहित होता है जो की देश के समस्त जल श्रोत का 25. 2 प्रतिशत हिस्सा ही है। इसके साथ ही साथ गंगा पांच राज्यों से होकर गुजरती और इसके बेसिन में लगभग 45 करोड़ लोगों की आबादी बसती है इसे हमारे राष्ट्रीय नदी होने का गौरव प्राप्त होने के वाबजूद इसके बहने के रास्ते में कई अड़चनें अवश्य हैं। जिस गंगा कार्य योजना की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई थी उस पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन बाद में वर्ष 2009 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की स्थापना हुई एवं उसके चेयरमैन स्वमं प्रधानमंत्री हैं।

इस परियोजना के लिए 2600 करोड़ रुपये वर्ल्ड बैंक से कर्ज ले कर कई योजनाओं की शुरुआत की गई। लेकिन गंगा सफाई का मामला आज तक जस का तस बना हुआ है। इसी प्राधिकरण ने भविष्य के लिए 7000 करोड़ के नए प्रोजेक्ट की रूपरेखा भी बना रखी है। बावजूद इसके गंगा की हालात वही है। एक बार पुंनः उसे 231 योजनाओं की सौगात मिली है लेकिन इसमें भी गंगा में पानी छोडे जाने को लेकर कोई बात नहीं कही गई है। ऐसे में गंगा का जल क्या बिना उचित व्यवस्था किये बिना ही स्वछ एवं निर्मल हो पाएगी यह आगे भविष्य में देखने वाली बात होगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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