नदीम एस अख्तर
चलिए एक और इम्तिहान खत्म हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परीक्षा. चुनाव जिताकर बीजेपी को सत्ता में लाने का टास्क , जो उनके कंधों पे 2014 के बाद से लगातार है, उसकी एक और कड़ी बंध गई. करिश्मा ये है कि राहुल गांधी के जरिए कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाने वाली बीजेपी खुद व्यक्तिवाद का शिकार होकर -वन मैन आर्मी- नरेंद्र मोदी के आसरे जीवन-यापन कर रही है. खैर !
तो गुजरात कौन जीतेगा ? मोदी समर्थक और मोदी विरोधी अपने-अपने तर्क दे रहे हैं. पर इस झमेले से दूर बतौर एक ऑब्जर्वर मेरा मानना है कि इस दफा गुजरात में वाकई बीजेपी की हालत पतली है. बीजेपी को वहां सत्ता में आए 15 साल से ज्यादा हो गए, इतने साल किसी भी पार्टी के लिए एंटी इनकम्बैंसी जुटाने के लिए काफी होते हैं. दूसरी बात. नरेंद्र मोदी अगर अब भी वहां सीएम होते तो गुजरात में बीजेपी का गढ़ अभेद्य था. पर मोदी जी के पीएम बनने के बाद जिस तरह उनके उत्तराधिकारियों ने राज्य में पार्टी की मिट्टी पलीद की, उससे जनता में एंटी इनकम्बैंसी के अलावा एक और अलग तरह का गुस्सा है।
सो मान लीजिए कि इस दफा गुजरात में बीजेपी की हालत वैसी नहीं है, जैसी मोदी जी के राज में सीएम रहते होती थी. मेरी जानकारी के अनुसार पार्टी और संघ को भी अंदरखाने इसकी जानकारी है, इसीलिए इस दफा बीजेपी ने गुजरात जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी. केंद्रीय मंत्रियों के दलबल के साथ पीएम ने खुद मोर्चा संभाला हुआ था. इसका कारण है।
गुजरात महज एक राज्य नहीं है। वह मोदी जी का घर है, जहां से निकलकर और जिसके बूते वो पीएम बने। सो गुजरात हारना ना पार्टी अफोर्ड कर सकती है और ना मोदी जी, वरना 2019 पर ग्रहण लग सकता है। शायद यही वजह रही कि मोदी जी के भाषणों में पाकिस्तान का जिक्र आ गया, जिसे लेकर विवाद भी हुआ. इसे ऐेसे समझिए. अगर सारी दुनिया किसी की दुश्मन हो जाए तो वह भागकर घर आता है, वहां आसरा लेता है. अगर घर वाले ही भगा देंगे, तो फिर वह कही का नहीं रहेगा. यही वजह रही होगी कि मोदी जी ने चुनावी रैली में कह भी दिया कि आप सहारा नहीं देंगे तो किधर जाऊंगा !! और ये मान लीजिए कि मोदी जी का गुजरातियों के साथ (खासकर शहरों में) एक इमोशनल कनेक्ट तो है. गुजरात एक राज्य नहीं, मोदी जी के लिए नाभिनाल है, उनकीं ऊर्जा का पावर हाउस है. उसे खोना मतलब सब कुछ गंवा देना।
फिर इस चुनाव में होने क्या जा रहा है ? मेरी समझ से तीन स्थितियां हैं। पहली, बीजेपी साधारण बहुमत से सरकार बना लेगी. दूसरी, कांग्रेस साधारण बहुमत से सरकार बनाएगी और तीसरी ये कि बीजेपी भारी बहुमत से दुबारा सत्ता में आएगी।
अब पेंच यही है। इस दफा गुजरात ने अच्छे-अच्छों को चकरघिन्नी बना दिया है। राहुल-हार्दिक एंड कम्पनी फैक्टर ने पूरा गणित बदल दिया है और इनको हल्के में लेने की भूल नहीं करनी चाहिए. पर उनको मिला जनसमर्थन वोट में कन्वर्ट हुए या नहीं और इसके लिए ग्राउंड लेवल पर उन्होंने क्या काम किया था, इस पे बहुत कुछ निर्भर करेगा. लेकिन जनता उनके पीछे भाग रही थी, ये सच है और इस बात ने इस बार वहां बीजेपी को बहुत परेशान किया है।
सो गुजरात पर इस दफा मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता. अलग-अलग फैक्टर को लेकर देखता हूं तो हर बार, ऊपर लिखी परिस्थितियों में से तीनों एक-एक कर सही होती दिखती हैं. लेकिन अगर मोटे तौर पे कहूं तो इस पूरे हो-हल्ले के बाद लगता यही है कि बीजेपी जैसे-तैसे वहां फिर सरकार बनाने में सफल हो जाएगी. हां, राहुल-हार्दिक एंड कम्पनी को मिला जनसमर्थन उन्हें कितनी सीटें दिला पाएगा, ये देखना रोचक होगा क्योंकि एक बात तय है. इस बार के गुजरात चुनाव नें राहुल गांधी कोे मोदी जी के बरक्स एक मजबूत और मैच्योर प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित कर दिया है. इसलिए अब उन्हें पप्पू बोलकर हल्का करने की कोशिश रंग नहीं लाएगी. साथ ही अब वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए हैं, सो आगे से वो जो बोलेंगे, उसे दुनिया बहुत सीरियसली लेगी।
लब्बोलुबाब ये है कि हो सकता है बीजेपी साधारण बहुमत से या फिर आश्चर्येजनक रूप से अच्छे बहुमत से वहां सरकार बना ले पर गुजरात चुनाव ने राहुल गांधी को भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया है और यही बात कांग्रेस पार्टी के लिए गुजरात का सबसे बड़ा उपहार है।
2019 का चुनाव बहुत दिलचस्प होने वाला है, परिणाम का इन्तजार है बस देखते जाये!







