ओम माथुर
कांग्रेस नेता राहुल गांधी संगठन में सुधार की बातें तो बहुत अच्छी करते हैं, लेकिन उन्हें लागू नहीं कर पाते हैं। वह जानते हैं कि कांग्रेस किस-किस बीमारी से पीड़ित है,उसे कौनसे इलाज की जरूरत है। लेकिन वह मुंहजबानी ही इसका इलाज करना चाहते हैं। जबकि कांग्रेस को पूरी सर्जरी की जरूरत है। यह राहुल ही नहीं, हर कोई जानता है कि कांग्रेस में बड़े नेताओं की सिफारिश या चमचागिरी करके टिकट और पद लिए जाते हैं। यह भी हर कोई जानता है कि हर राज्य में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपना-अपना गुट बनाकर राजनीति करते हैं और यह गुटबाजी जिला स्तर, ब्लॉक स्तर यहां तक की वार्ड स्तर तक पर होती है। राहुल यह भी जानते हैं कि कई नेता कांग्रेस में रहकर भाजपा की मदद करते हैं और खुद का भविष्य बचाने या बनाने में लगे हैं। वह यह भी जानते हैं कि कांग्रेस में ऐसे कई बड़े नेता हैं,जो अपने क्षेत्र में बूथ जिताने की हैसियत नहीं रखते। लेकिन वही संगठन को अपने इशारों पर चला रहे हैं।
कल मध्य प्रदेश में भी उन्होंने संगठन सृजन अभियान शुरू करते हुए उन्होंने फिर इन बातों को दोहराया। इसके पहले वह गुजरात में भी ये बातें कर चुके हैं। लेकिन गुजरात से मध्य प्रदेश तक हुए कार्यक्रमों में कांग्रेस में कोई ऐसी कार्रवाई हुई यह नजर नहीं आती है। जबकि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस सालों से सत्ता से बाहर है। कल राहुल ने कांग्रेस नेताओं की तुलना घोडों से करके उन्हें तीन श्रेणियों में बांटते हुए संगठन में सुधार के संकेत दिए। उन्होंने कहा रेस के घोड़े, बारात के घोड़े और लंगड़े घोड़े यानि नेताओं को अलग-अलग करना है। रेस के घोड़े से उनका मतलब चुनाव लड़ने वाले नेता, बारात के घोड़े से उनका आशय संगठन में लेने वाले नेता और लंगड़े घोड़े से उनका आशय उन नेताओं से था, जिन्हें रिटायर कर घर बैठाना है। इसके पीछे उनके मंशा गुटबाजी को दूर करने और संगठन को मजबूत कर फिर पार्टी को सत्ता की राह पर लाने से है।
लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस में तो लम्बे समय से अधिकांश लंगड़े और बारात वाले घोड़े ही राज कर रहे हैं और इन्हें सबसे ज्यादा पाला-पोसा भी गांधी परिवार की घुड़साल में ही गया है। इन बारात और लंगड़े घोड़ों ने गांधी परिवार की चाटुकारिता करके कांग्रेस में रेस के घोड़ों को मैदान से ही बाहर कर दिया है। संगठन हो या बचीकुशी सत्ता, गांधी परिवार की घुड़साल से निकले नेता ही हरी घास यानि पद प्राप्त कर रहे हैं और फल फूल रहे हैं। अगर राहुल,सोनिया और प्रियंका गांधी ऐसे नेताओं पर से अपना हाथ हटा ले,तो कांग्रेस आधी तो वैसे ही सुधर जाएगी और इससे मेहनती, अनुशासित तथा अपने इलाके में आधार रखने वाले नेताओं के उभरकर सामने आने का रास्ता खुलेगा। लेकिन क्या ऐसा कांग्रेस में संभव है? शायद नहीं। क्योंकि गांधी परिवार के आशीर्वाद और सरपरस्ती से सालों से फल फूल रहे ऐसे घोड़ों ने ही कांग्रेस को अपने शिकंजे में बुरी तरह से जकड़ रखा है। ये घोड़े राजनीति में नई पौध को ना तो विकसित होने देना चाहते हैं और ना ही आगे बढ़ने देना चाहते हैं। गांधी परिवार को भी ऐसा कोई नेता कहां सुहाता है, जो रेस का घोड़ा है और लोगों में लोकप्रिय हो।
जो काम कांग्रेस में सालों से नहीं हुआ क्या उसे राहुल गांधी करके दिखा सकते हैं। क्योंकि मंचों से भाषण देकर तालियां बजवाना और उसे अमल में लाना दो अलग-अलग बातें होती है। कभी किसी नेता की फंड उपलब्ध कराने की दक्षता की मजबूरी है, तो कभी किसी नेता के उसके राज्य में प्रभाव के चलते कांग्रेस आलाकमान यानि गांधी परिवार रेस के घोड़ों से नजरें फेर लेता है। कई राज्यों में इसके उदाहरण देखे जाते रहे हैं और राजस्थान भी इसका एक उदाहरण है। जहां रेस के घोड़े माने जाने वाले सचिन पायलट को किस तरह वर्ष 2019 के बाद लगातार नजरअंदाज किया गया,यह सभी ने देखा है। राजस्थान में अशोक गहलोत, सीपी जोशी,हरीश चौधरी,भंवर जितेंद्र सिंह,गोविंद सिंह डोटासरा, टीकाराम जूली, प्रताप सिंह खाचरियावास, रघु शर्मा दिव्या मदेरणा, रामलाल जाट,अशोक चांदना, नीरज डांगी, प्रमोद जैन भाया सहित कांग्रेस की अंग्रिम पंक्ति के घोड़ों को भी श्रेणीबद्ध कर राहुल गांधी को फैसला जल्द करना होगा कि वो किसे कौनसा घोड़ा मानते हैं। राजस्थान में तो रिटायरमेंट लायक घोड़े ही अभी भी ज्यादा घास का आनंद ले रहे हैं और रेस वाले घोड़ों की लगामथामे हुए हैं। राहुल गांधी को कांग्रेस का कायाकल्प करना है,तो हर राज्य में संगठन की व्यापक सर्जरी करनी होगी और उन नेताओं को संगठन से दूर करना होगा जो गांधी परिवार के नाम का पट्टा टांगकर लंगड़े घोड़े होने के बावजूद आगे हैं।
सवाल ये भी है कि जब कई कांग्रेस के नेता खुलकर भाजपा के समर्थन में बयानबाजी कर रहे हैं,तो फिर क्यों नहीं राहुल उनके खिलाफ एक्शन लेते हैं। जाहिर है ऐसे नेताओं को जब पार्टी दंडित नहीं करती है, तो अन्य नेताओं की हिम्मत भी खुल जाती है और यही आलाकमान की कमजोरी को दर्शाता है। शशि थरूर,सलमान खुर्शीद इसीलिए इन दिनों भाजपा की पसंद बने हुए हैं। यूं राहुल गांधी खुद कांग्रेस को सत्ता की राजनीति में तो आगे बढ़ा नहीं पाए हैं,लेकिन अगर वह संगठन को मजबूत कर पाए तो उनकी उपलब्धि मानी जाएगी। क्योंकि मजबूत संगठन के बिना कोई भी पार्टी सत्ता हासिल नहीं कर सकती है और फिलहाल कांग्रेस का संगठन नीचे से ऊपर तक पूरी तरह से चरमराया हुआ है,ध्वस्त है और लंगड़े घोड़ों के हाथ में है।







