ओम माथुर
बात कोई 25-30 साल पुरानी है। जब मैं दैनिक नवज्योति में रिपोर्टर था। यह वह दौर था जब अजमेर में चार-पांच दिन में पानी आया करता था और पानी के लिए भीषण मारामारी रहती थी। एक दिन खबर के सिलसिले में महावीर सर्किल सि्थत जलदाय विभाग के दफ्तर में एक्सईएन के पास बैठा था। तभी बाहर से नारेबाजी की आवाजें आने लगी। एक्सईएन सुनते ही बोले,लगता है किसी मौहल्ले में ज्यादा ही दिन हो गए पानी वितरण हुए। उन्होंने जेईएन से कहा कि बाहर जाकर आठ-दस लोगों को अंदर बुला लो। पांच मिनट बाद दस लोग शिष्टमंडल के रूप में आ गए। सभी गुस्से में और नाराज दिख रहे थे। एक्सईएन ने उन्हें बैठाया। ठंडा पानी पिलवाया। फिर समस्या पूछी। उनमें से एक नेता टाइप व्यक्ति बोला, सप्ताह भर से पानी नहीं आया। बहुत हालत खराब है। एक्सईएन ने मुस्कराते हुए कहा,कोई बात नहीं। अभी आप जब तक वापस घर पहुंचेंगे। पानी आ जाएगा। फिर जेईएन से बोले, आगे से इनके क्षेत्र का ध्यान रखना। मैनें देखा गुस्से में आए सभी लोग धन्यवाद कहते हुए खामोशी से चैंबर से बाहर निकल गए। मैंने एक्सईएन की ओर देखा। उन्होंने हंसते हुए कहा, यही तो अजमेर के लोगों की खूबी है। हर हाल में संतुष्ट रहते हैं।
7 दिन से पानी नहीं आने का गुस्सा लेकर आए थे। मैंने कहा कुछ देर में आ जाएगा, तो कितने प्रेम से आभार जताते हुए चले गए। बिल्कुल जैन्टलमेन की तरह । फिर उन्होंने खुद ही अपने पिछले कार्यस्थल कोटा का किस्सा सुनाया और कहा कि वहां सुबह-शाम पानी की सप्लाई होती थी। अगर किसी सुबह पानी नहीं आता था, दोपहर तक उस इलाके के लोग ऑफिस आ जाते थे और धमका जाते थे कि शाम को पानी नहीं आया तो ठीक नहीं होगा। फिर बोले,अजमेर में नौकरी करने का यही आनंद हैं। लोग सहनशील हैं। हर हाल में संतुष्ट रहते हैं। आश्वासनों पर भरोसा कर लेते हैं। नेता आपस में लड़ते रहते हैं। उन्हें भी लोगों से ज्यादा अपनी राजनीति चमकाने की लगी रहती है। बस,जिसकी चलती है, उस नेता को सैट करके जब तक इच्छा हो अजमेर में टिककर मजे से नौकरी करो।
यह किस्सा बरबस इसलिए याद आ गया कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत बनाए गए कई नियमविरुद्ध निर्माण कार्य सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ध्वस्त किए जा रहे हैं। लेकिन अजमेर के बाशिंदे खामोश बिल्कुल जेंटलमैन बने हुए बैठे हुए हैं। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके ही टैक्स के करोड़ों रुपए मटियामेट किए जा रहे हैं। लेकिन वह ये सवाल ही नहीं उठा रहे कि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्यों कार्यवाही नहीं है रही। क्यों करोड़ों रूपए के नुकसान की वसूली इन अफसरों से नहीं की जाए। और जब उनके हलक में वसूली का डंडा घुसेगा,तो वो संरक्षण देने और उनसे स्मार्ट सिटी योजना में बराबर माल कमाने वाले नेताओं के नाम भी उगल सकते हैं। जब आनासागर को बर्बाद कर फूड कोर्ट, सेवन वंडर और पाथवे बनाए जा रहे थे,तब भी लोग खामोश थे और अब जब उनके टूटने के आदेश और सिलसिला शुरू हो गया, तब भी वो खामोश ही है। करीब साढे़ पांच करोड़ में बना फूड कोर्ट मिट्टी म़े मिल चुका है। करीब 11 करोड़ की लागत से बने सेवन वंडर को सात मई से पहले जमींदोज किया जाएगा। तोडने के टेंडर जल्द हो जाएंगे। और जो हालात बन रहे हैं उससे खतरा पाथवे पर भी खतरा मंडरा रहा है। लेकिन अजमेर के लोग और नेताओं के कोई फर्क नहीं पड़ता। जब ये नहीं बने थे,तब भी हम संतुष्ट थे,अब टूट जाएंगे, तो भी क्या फर्क पड़ता है। जैसा पहले था,वैसा ही तो जाएगा ना।
चलिए, गलत बना दिए। वैटलैंड में बना दिए। सुप्रीम कोर्ट ने तोड़ने के आदेश दिए,तो तोड़ दीजिए। लेकिन जिम्मेदारी तो तय कीजिए। इनका निर्माण गलत कर रहे हैं,ये अधिकारियों को तब भी जरूर मालूम होगा। लेकिन उन्हें भरोसा होगा कि सरकारी निर्माण कोई तुडवा थोडे़ ही सकता है। अरबों रूपए की स्मार्ट सिटी योजना के टेंडरों और निर्माण में कमीशनबाजी के लड्डू अफसरों ने नहीं,नेताओं ने भी छककर खाएं होंगे। चलिए, मान लेते हैं,योजना के काम कांग्रेस के शासन में हुए,इसलिए उसके नेता ही माल जीम गए। भाजपा नेता बिल्कुल साफ-सुथरे और ईमानदारी का एफिल टावर हैं। लेकिन अफसर तो अभी भी वहीं हैं,जो कांग्रेस राज में भी थे और भाजपा राज में भी हैं। कुछ ही रिटायर हुए हैं,लेकिन वो भी जाएंगे कहां। जब सारा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का भ्रषटाचार कांग्रेस राज में हुआ था,तो फिर अब तो भाजपा की सरकार है वह भी ट्रिपल इंजन वाली। नगर निगम, राज्य सरकार और केंद्र सरकार। क्यों नहीं सरकार अपने स्तर पर जांच कराकर भ्रष्ट अफसरों और संरक्षक नेताओं के चेहरे सामने लाती है। सरकार ऐसा करके और जिम्मेदारों से वसूली करके देशभर में मिसाल कायम कर सकती हैं।

राज्य के सबसे बड़े पदों में से एक विधानसभा अध्यक्ष के पद पर अजमेर उत्तर के विधायक वासुदेव देवनानी हैं। वैसे वो पिछले 21 साल से विधायक हैं और उनके रहते ही स्मार्ट सिटी के काम सबसे ज्यादा भी उन्हीं के क्षेत्र में हुए। लेकिन गलत व नियमविरुद्ध काम रोकने में वो तब इसलिए मजबूर थे,क्योंकि सरकार कांग्रेस की थी। उनके विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद से मीडिया लगातार ये बता रहा है कि देवनानी ने 20 साल में अजमेर के विकास की कसर को आने वाले 4 साल में दूर करने का बीडा उठाया है। उन्होंने अफसरों को तान रखा है और समयबद्ध काम पूरा करने का एजेंडा दिया है। दो बजट में हजारों करोड़ के काम अजमेर के लिए मंजूर कराए हैं,जो सरकार में उनके प्रभाव का सूचक है। ऐसे में अगर देवनानी अपने पद व प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के भ्रष्ट और लुटेरे अफसरों और संरक्षक नेताओं के चेहरे जनता के सामने और उनसे तोड़फोड़ वाले कामों की वसूली करा दें,तो अजमेर के लोग उन्हें हमेशा याद रखेंगे कि कोई ऐसा नेता था, जिसने जनता की मेहनत की कमाई पर डाका डालने वाले अफसरों को छठी का दूध याद दिला दिया था।
युवा कांग्रेस ने तोड़फोड़ से होने वाले नुकसान की वसूली के लिए आंदोलन चलाया। यह उनकी हिम्मत है,क्योंकि अगर जांच हुई तो उनके कई चपेट में आ सकते हैं। लेकिन फिर भी उनका प्रयास सराहनीय था। शहर में सैंकड़ों सामाजिक एवं शस्वयंसेवी संगठन है। जो छोटे-छोटे मुद्दों पर अपनी सक्रियता तो दिखाकर छपास का शौक पूरा करते हैं। लेकिन इस मुद्दे पर उनमें से कोई कहीं नजर नहीं आता। एक बार सभी सामूहिक रूप से इस बात को लेकर जुलूस ही निकाल दे़, तो समझ में आए कि शहर को लेकर उनके मन में वास्तव में चिंता है अखबारी चिंता नहीं है। एक सवाल मन में भी आता है कि क्या अफसरों का हर सरकार में इतना रुतबा होता है कि वह अपने खिलाफ कोई जांच होने नहीं देते है या फिर नेता उन इतने निर्भर होते हैं कि उन्हें छेड़ने की हिम्मत नहीं करते। आखिर में अजमेर की शांतिप्रिय,सहनशील और हमेशा हर हाल में संतुष्ट रहने वाली जनता को एक बार फिर प्रणाम।







